
राजनीति की कुशल निशानी,मेवाड़ की हाड़ी रानी।
बूंदी में जो थी जन्मी,कर्णावती की अमर कहानी।
-धीरज कुमार शुक्ला’फाल्गुन’
मेवाड़ की रानी कर्णावती, जिन्हें कर्मावती नाम से भी जाना जाता है इनका जन्म वीरों की भूमि राजस्थान के बूंदी राजघराने में हुआ था। एक राजकुमारी होने के कारण इन्हें राजनीतिक कुशलता का ज्ञान होना स्वाभाविक था और अपने इसी राजनीतिक कौशल का प्रयोग इन्होंने मेवाड़ में शासन संचालित करने और कठिनतम परिस्थितियों में निर्णय लेने में किया।
रानी कर्णावती का जीवन परिचय:-
हाड़ा राजघराने में जन्मी हाड़ा चौहान राजकुमारी के पिता बूंदी के छठे राव बंदूजी के पुत्र राव निर्बुद्ध की सुपुत्री थी।इनका और इनकी बहन राजकुमारी लाखूदेवी दोनों का परिणय राणा सांगा के साथ किया गया था।
रानी कर्णावती के पुत्र राजकुमार विक्रमादित्य और राजकुमार उदय सिंह थे। रानी कर्णावती मेवाड़ शिरोमणि महाराणा प्रताप की दादी मां थी।राणा संग्राम सिंह जिन्हें राणा सांगा के नाम से भी जाना जाता है का शासनकाल १५०९-१५२८ तक रहा । इन्हीं राणा संग्राम सिंह के शरीर पर अस्सी घाव लगे होने के कारण इन्हें अंग्रेज इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने “सैनिक का भग्नावशेष” कहा है।
रानी कर्णावती ने अपने नाबालिग पुत्रों के कारण १५२७-१५३३ तक शासन कार्य किया। इनमें साहस और शौर्य भाव का कोई अभाव नही था इन्होंने गुजरात के शासक बहादुरशाह के आक्रमण का एक छोटी सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए सामना किया जब तक की बहादुरशाह ने चित्रकूट दुर्ग पर अधिकार नही कर लिया।
महारानी का विधवा जीवन:-
सन् १५२६ ई. में जब दिल्ली पर मुग़ल बादशाह बाबर द्वारा शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली गई तब महाराणा संग्राम सिंह ने राजस्थान में शासन कर रहे राजाओं को बाबर के विरूद्ध रणक्षेत्र में लड़ने के लिए साथ देने हेतु पत्र भेजकर आमंत्रित किया गया जिसे राजस्थान में “पाती परवण” परंपरा कहते हैं और इसका प्रभाव भी परिलक्षित हुआ और समस्त राजपूत राजाओं ने जिन्हें पत्र भेजकर आमंत्रित किया गया था सबने इसे स्वीकार कर लिया।
बयाना का युद्ध (१६/फरवरी/१९२७) :- बयाना, भरतपुर के इस युद्ध में राणा संग्राम सिंह के नेतृत्व वाली सेना ने बाबर की सेना को रणभूमि में धूल चटा दी जिससे बाबर के सैनिकों में एक भय व्याप्त हो गया।
खानवा का युद्ध (१६/मार्च/१९२७):-बयाना युद्ध में राजपूतों के रण कौशल को देखकर बाबर के सैनिकों ने खानवा युद्ध लड़ने से इन्कार कर दिया लेकिन फिर बाबर ने धार्मिक कर से मुक्ति, शराबबंदी और इस्लाम की सौगंध देकर सैनिकों को लड़ने के लिए तैयार किया।खानवा युद्ध में पहली बार भारत में तोपों का प्रयोग किया गया और तुलगमा युद्ध शैली में यह युद्ध लड़ा गया , कुशल युद्धनीति, तोपखाने का प्रयोग और तुलगमा पद्धति के कारण इस युद्ध में राजपूतों की पराजय हुई।
३० जनवरी १९२८ को राणा संग्राम सिंह का जीवननांत हो गया।
राणा संग्राम सिंह की मृत्यु पश्चात् राणा रतन सिंह मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठते हैं।उस समय महारानी कर्णावती अपने दोनों पुत्रों के साथ रणथंभौर दुर्ग में रहने लगी। इनके द्वारा अपने चचेरे भाई बूंदी के राव सूरजमल को अपना प्रतिनिधि चुना गया।जो रिश्ते में रतन सिंह के बहनोई भी लगते थे।
रतन सिंह ने महारानी कर्णावती को आदेश दिया की कर्णावती चित्तौड़ लौटकर राणा सांगा द्वारा मंदसौर का घेराव करके मालवा शासकों से जो खजाना लूट लिया था वह उसे लौट दे।
ऐसा संभव हुआ नही।इन सबकों छोड़कर रानी कर्णावती ने बाबर से बात करके मेवाड़ राज्य के लिए बयाना की भूमि लौटाने की बात कही लेकिन ऐसा संभव न हो सका।
शासिका के रूप में :-
सन् १५३१ में शिकार के समय रतन और सूरजमल आपस में लड़ गए जिसके कारण मेवाड़ राज्य का राजसिंहासन कुंवर विक्रमादित्य को मिल गया। विक्रमादित्य के शासनकाल में महारानी कर्णावती द्वारा शासन व्यवस्था की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली।
गुजरात के शासक बहादुरशाह द्वारा पहले पराजित हुए राणा विक्रमादित्य के साथ बहादुरशाह के अगले आक्रमण के समय वहॉं के सरदारों ने लड़ने से इनकार कर दिया। महारानी कर्णावती इसको लेकर बहुत चिंतित थी और उन्होंने मेवाड़ी सरदारों को एक पत्र लिखकर राणा विक्रमादित्य के लिए न सही लेकिन मेवाड़ की शान की रक्षा करने के लिए लड़ने के लिए सरदारों को तैयार कर लिया और अपने दोनों पुत्रों राणा विक्रमादित्य और कुंवर उदय सिंह को बूंदी भेज दिया गया।
बहादुर शाह के इसी आक्रमण के समय महारानी कर्णावती द्वारा मुग़ल बादशाह हुॅंमायूं के पास उन्हें अपना भाई मानकर राखी भेजी,जो हुॅंमायूं के पास तो पहुॅंच गई लेकिन हुॅंमायूं मेवाड़ की समय पर सहायता नही कर सका और मेवाड़ राज्य में चित्तौड़ पर बहादुर शाह का अधिकार हो गया। क्योंकि बहादुर शाह के पास जहाॅं विशाल सेना थी वहीं मेवाड़ी सरदारों की संख्या बहुत सीमित थी, मेवाड़ी सरदारों ने जहॉं युद्ध में केसरिया किया वहीं मेवाड़ की महारानी कर्णावती और अन्यान्य सरदारों की स्त्रियों ने अपने आप को जौहर की आग को समर्पित कर दिया और इस प्रकार यह साका मेवाड़ का दूसरा साका कहलाता है।
अपनी आन बान शान के लिए अपने प्राणोत्सर्ग करने वाली अनेकानेक रानियों ने यहॉं जन्म लिया और उन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राणोत्सर्ग तक कर दिए।
ऐसे वीर वीरांगनाओं के लहू से लिखी अनगिनत समर्पित ऐतिहासिक कहानियों से यह राजस्थान की धरा धन्य हो गई है।
नमो मातृभूमे,नमो मातृशक्ते।
नमामि नमामि देवी सर्वभूते।
भावम् च भव्यम् त्वं नमस्ते।
गीतम् च सत्यम् नमोऽम् सहिते।
कवि,लेखक, गीतकार,साहित्यकार:-
धीरज कुमार शुक्ला’फाल्गुन’
ग्राम-पिपलाज,तहसील-खानपुर,
जिला-झालावाड़ ,राजस्थान (३२६०३८)




