
शादियां भव्य हो गई है।
रिश्ते शून्य हो गए हैं कैसा यह समय आया घर आंगन सब सूने हो गए हैं।
बढ़ रहा एकाकीपन
सबके मन पर बोझ दूने हो गए हैं।
समय के साथ रिवाज बदल गए हैं रिश्ते अब एटीएम मशीन बन गए हैं।
मरना और जीना कुछ भी तो अब सरल ना रहा
अस्पताल के दाम अब दूने हो गए हैं।
व्यवसायीकरण भावनाओं का भी हो चुका है।
सोशल साइट अब भावनाओं की दुकान हो गए हैं।
कवि हृदय लेकर घूमना बेकार है
यूं लगता है सबके चेहरे भाव शून्य हो गए हैं।
अपनाओ वही जो हो सर्वदा सही।
भावनाओं के बिना जीवन सार्थक होगा ही नहीं।
अत्यधिक धन कमाने से क्या होगा जब कोई रिश्ते बचेंगे ही नहीं।
मधु वशिष्ठ, फरीदाबाद, हरियाणा



