
आज एकाएक सामने खड़े आईने में
मेरा अक्स जो दिखा
मुझसे मेरी मुलाकात
यूँ ही हो गई।
मैं सोच में पड़ गई
मेरी उम्र कितनी बढ़ गई
मैं सबके लिए जीती रही
सबको खुश करने में
खुद पर नज़र ही नहीं पड़ी
शब्दों के पुल से नई पुरानी
पीढ़ी जोड़ती रही
खोने पाने के चक्कर में
खुद को भूल सबमें खोई रही
थक कर पड़ते ही
बहे अश्रुधार
क्या खोया क्या पाया
थी सोच निराधार
समय रहते ही दोस्तों
खुद के लिए चलो जी लें
बुझने से पहले चलो
खुद से मिल लें।
डॉ.पुष्पा सिंह




