
आया नया फिर साल, पिछले वर्ष जो देखा किया,
अवसाद हैं कुछ दर्द हैं, खुशियाँ कहीं देखी नहीं।
मनु का मनुज बैरी दिखा, ईर्ष्या दिखी बस डाह थी,
कंटक दिखे कर में सभी, कुसुमांजलि देखी नहीं।
देखा धुआँ बारूद का, जित ओर देखा व्योम में,
कुल होड़ थी विस्तार की, संतुष्टि तो देखी नहीं।
नुचती हुई नारी दिखी, हैवान फिर मानव मिला,
बस लूट में सब लिप्त थे, इंसानियत देखी नहीं।
भौतिक सुखों की चाह में, रोता हुआ इंसा मिला,
दर-दर भटकता वो रहा, पर शान्ति तो देखी नहीं।
हे ईश! कुछ कृपा तू कर, देखें नया नव वर्ष में,
‘नरेश’ को कुछ वह दिखा, जो आज तक देखी नहीं।
– नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।
सर्वथा मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना।
– नरेश चन्द्र उनियाल।




