
जबतक मन दासत्व भाव में,
झूठी हर आज़ादी है।
जाने क्यों नववर्ष पराया-
मना रही आबादी है।।
आज़ादी तो मिली मगर-
मिलकर भी अभी अधूरी है।
अपनी ही संस्कृति बिसराना-
जाने क्या मजबूरी है।
जिसे मूर्ख दिन कहकर गोरे-
अपना उल्लू साध गए।
अमर गुलामी के कीड़े को-
मन मंदिर में बांध गए।।
बात हकीकत गर समझो तो-
इतना महज बताना है।
चैत्र प्रतिपदा एक्कम को ही,
अब नववर्ष मनाना है।।
जिसदिन शिक्षासत्र शुरू हो,
जिसदिन वित्तवर्ष शुरुआत।
जिसदिन चैत्र प्रतिपदा होवे,
नवल वर्ष का धवल प्रभात।।
एक जनवरी में क्या रक्खा,
अंग्रेजों की देन छोड़कर।
हम अपना अस्तित्व मिटाते,
खुद संस्कृति से आँख मूंदकर।।
नववर्ष सभी को मंगल हो,
इससे हमको ऐतराज नहीं है।
लेकिन जैसे रहे पूर्वज,
वैसे तो हम आज नहीं हैं।।
चलो अभी से ये प्रण ठानें,
हम हरवर्ष निभायेंगें।
बासंतिक नवरात्र देखकर,
अब नववर्ष मनायेंगें।।
– डॉ.उदयराज मिश्र




