
नारी कोई परिभाषा नहीं,
वो सृष्टि की पहली आवाज़
है
जो सहकर भी मुस्कुरा दे,
वो मौन की सबसे ऊँची आवाज़ है।
कभी ममता बन गोद सजा ले,
कभी बन जाए पत्थर की ढाल,
टूटे सपनों की राख से भी,
खुद को गढ़ ले हर हाल।
चूल्हे से चौखट तक सीमित नहीं,
आसमान उसकी उड़ान है,
वो जब चाहे इतिहास रचे,
वो खुद ही अपनी पहचान है।
हर रिश्ते में खुद को बाँट दिया,
फिर भी कुछ न माँगा कभी,
दर्द को आँचल में छुपा लिया,
आँखों से छलका नहीं अभी।
जब नारी उठती है सवाल बनकर,
तो युग बदलने लगता है,
जो समाज उसे कम आँकता है,
वही सबसे पहले ढलने लगता है।
नारी दया भी है, शक्ति भी,
सहनशीलता की पहचान है,
वो झुकी नहीं, वो टूटी नहीं,
वो भारत की असली शान
है।
पूनम त्रिपाठी
गोरखपुर ✍️



