
भोगवादी संस्कृति के बढ़ते प्रभावों और शिक्षा क्षेत्र में दिनोंदिन हो रहे नैतिक अवमूल्यन के फलस्वरूप शहर – शहर पांव पसारते वृद्धाश्रमों को सभ्य समाज पर न केवल कलंक अपितु संतानों और उनके माता – पिता के प्रति उनके कर्तव्यों की इतिश्री भी कहा जा सकता है।जिसे श्रवण कुमार की कांवर और ध्रुव की पितृ भक्ति और ययाति पुत्र कुरु की कहानियों को अंगीकृत करते हुए अवश्यमेव पुनर्स्थापित करते हुए स्वस्थ समाज की संकल्पना को सफलीभूत किया जा सकता है। कहना अनुचित नहीं होगा कि पितृ भक्त श्रवण की कथा का अनुशीलन टूटते पारिवारिक संबंधों पर अमृत की रसधार की वृष्टि के तुल्य है।
रामचरितमानस में भाग्यशाली पुत्र का वर्णन करते हुए गोस्वामी जी प्रभु के श्रीमुख से कहलवाते हैं-
“सुनु जननी सोई सुत बड़भागी।
जो पितु मातु चरन अनुरागी।।
उपरोक्त पंक्तियों में गोस्वामी जी कहते हैं कि जो पुत्र अपने पिता और माता का मन,क्रम,वचन से आज्ञापालन करते हुए उनकी सेवा करता हुआ चरणों में अनुराग रखता है,उससे भाग्यशाली कोई अन्य नहीं हो सकता है।किंतु आज के परिप्रेक्ष्य में जबकि शहर-शहर वृद्धाश्रमों की भरमार होती जा रही है,औरकि संतानें अपने वृद्ध पुरजनो,परिजनों तथा माता-पिता का तिरस्कार करते हुए स्वछंद विचरण करने में मशगूल हैं,यह स्थिति नितांत सोचनीय और कि वृद्धाश्रमों के मुंह पर श्रवण कुमार का चरित्र किसी तमाचे से कम नहीं है।अस्तु कहना अनुचित नहीं होगा कि भारतीयता के पुट से सराबोर गंगाजमुनी तहजीब में वृद्धाश्रमों बाहुल्य कदाचित संतानों में बढ़ते नैतिक क्षरण व मानवीयमूल्यों के घटते प्रभावों के प्रतिफल हैं।ऐसे में पितृभक्त श्रवण कुमार की कथा को पाठ्यक्रम का अंग बनाया जाना नितांत समीचीन और प्रासङ्गिक लगता है।
वस्तुतः हमारी सनातन संस्कृति में वृद्धों को सदैव से विशिष्ट स्थान दिया जाता रहा है।हमारा दैनिक जीवन उन्हीं के चरणों में प्रणाम से शुरू होकर उनकी सेवा के साथ ही समाप्त होता था।सुभाषितरत्नानिभण्डागाराम में लिखा गया है कि-
अभिवादनशीलस्य नित्य वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम।।
अर्थात जो व्यक्ति अभिवादनशील और प्रतिदिन वृद्धों की सेवा करता है,आदर करता है,वह दीर्घजीवी होता है,विद्वान होता है,यशस्वी होने के साथ ही साथ शक्तिशाली भी होता है।इस प्रकार जो कामनाएं अन्य उपागमों और साधनों से परिपूर्ण नहीं हो सकतीं ,वे वृद्ध जनों की सेवा से स्वत: ही प्राप्त होती हैं।
इसीतरह गोस्वामी जी मानस में ही लिखते हैं कि-
“जबहिं प्रात जागहिं रघुनाथा।
मात पिता गुरु नावहिं माथा।।
इसीप्रकार मानस में ही ध्रुव जिस पितृभक्त का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि-
नृप उत्तानपाद सुत जासु।
ध्रुव हरिभगत भयउ सुत तासू।।
इसप्रकार प्राचीन भारतीय वाङ्गमय हमें बुजुर्गों, वृद्धों और तात-मात की सेवा करते हुए जीने का संदेश देते हैं किंतु दुर्भाग्य से आज इसका दिनोंदिन क्षरण होता जा रहा है।जिसके लिए कहीं न कहीं हमारे पारिवारिक,शैक्षिक व सामाजिक परिवेश तथा मानवीय मूल्यों सहित संवेदनाओं का ह्रास ही है।जिस निमित्त परिवार को संस्कारों की तथा विद्यालयों को सामाजिक समरसता सहित संवेदनाओं की पाठशाला बनना होगा।यही नहीं मूल्यपरक शिक्षानीतियों के सम्यक क्रियांवयन,अनुश्रवण तथा दैनिक जीवन में महापुरुषों के जीवनवृत्तों से भी आनेवाली पीढ़ियों को देना वर्तमान की जिम्मेदारी है।जिम्मेदारी के निर्वहन के अभाव में आनेवाले दिन घर घर वृद्धाश्रम की संकल्पना को जन्म देंगें तथा श्रवण कुमार जैसी मूल्यपरक शिक्षाप्रद कथाएं कोरी कागजी बनकर रह जायेंगीं।
महाकवि कालिदास ने भी अभिज्ञान शाकुंतलम में धर्मपुत्री शकुंतला को उसके पति महराज दुष्यंत के यहां भेजते समय भी मूल्यपरक सम्यक शिक्षा भी निम्नवत दी गयी है-
शुश्रुष्व गुरुन कुरु प्रिय सखीवृत्तम सपत्नीजने।
महाकवि कालिदास के उक्त श्लोक का हिंदी कविता के रूप में राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान प्राप्त साहित्यकार शिक्षक ने निम्नवत सुंदर शब्दों में वर्णन किया है-
गुरुओं की सेवा तुम करना,सौतों को सखी बना लेना।
अपमानित होकर राजन से,अपने अनुकूल मना लेना।।
नौकर चाकर पर दया दिखा,नहीं भाग्य पर इतराना।
हे पुत्री, तुम पत्नी बनकर, भाग्यलक्ष्मी बन जाना।।
इसप्रकार स्प्ष्ट है कि प्राचीन भारतीय परम्पराओं में गुरुओं अर्थात अपने उम्र,शिक्षा,संस्कार और अनुभवों में बड़े लोगों के प्रति प्रथम दृष्टया सम्मान की शिक्षा बालक-बालिकाओं दोनों को ही दी जाती थी।जिसका की आजके आधुनिक परिवेश में सर्वथा अभाव होता जा रहा है।कदाचित दिनोंदिन खुलते वृद्धाश्रम इसी की परिणति हैं।जिन्हें श्रवण कुमार,ध्रुव, नचिकेता आदि मातृ पितृ भक्तों की कहानियों के सम्यक अनुश्रवण से सुधारा जा सकता है।
सारसंक्षेप में बस इतना ही कहना पर्याप्त है कि श्रवण कुमार की कथा दिनोंदिन कमतर होते जा रहे सम्बन्धों को सुदृढ बनाने हेतु किसी रामसेतु से कम नहीं है,क्योंकि मूल्यों का ह्रास होने मौद्रिक विकास से लाखों गुना नुकसानदेह होता है।इस निमित्त गांधी जी द्वारा बचपन मे बाइस्कोप द्वारा श्रवण कुमार व सत्यवादी हरिश्चंद्र का देखा गया नाटक एक सुंदर दृष्टांत भी प्रस्तुत किया जा सकता है।अस्तु दोष संतानों से अधिक उनके माता-पिता व पूर्वजों का भी है जोकि आधुनिकता की आंधी में नैतिकता व चारित्रिक विकास को गौण समझकर अपने पाल्यों को येनकेन धनार्जन की शिक्षा मात्र ही देने में लगे हैं।सत्य तो यही है कि वृद्धाश्रम हमारे नैतिक पतन की नींव पर खड़ी ऐसी इमारतें हैं जो हमें हमारे ही नैतिक पतन का दर्शन तो कराती हैं किंतु हम समझ नहीं पा रहे हैं।जिसे श्रवण कुमार जैसे मातृ पितृ भक्त संतानें ही ढहा के फिर से प्रेममयी इमारत में तब्दील कर सकती हैं।
– डॉ.उदयराज मिश्र
मण्डल अध्यक्ष, अयोध्यामण्डल
राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ,उत्तर प्रदेश
(माध्यमिक संवर्ग)



