साहित्य

अब दिल नहीं चाहता किसी को भी

रिया राणावत

दिल को अब किसी सहारे की तलब ही नहीं,
इतनी ठोकरें मिली हैं कि खुद पत्थर हो गए ।
अब दिल नहीं चाहता किसी ओर के ख्वाबों में जीना ,
क्योंकि अब उसको खुद से कोई खफा ही नहीं ।

दिल सोचता नहीं एक बार भी ,
किसी पर आ जाने से पहले ।
पर जब दिल टूटता है,
तो खुद को ही डूबा पता हैं।

शायद इसलिए अब दिल नहीं चाहता किसी को भी,
क्योंकि अब उसके पास गेरो के लिए समय ही नहीं हैं।

– रिया राणावत
कालीदेवी, झाबुआ (मध्य प्रदेश)

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