
इश्क़ अगर रूह से रूह का तराना हो,
तो हर धड़कन में बस एक फ़साना हो।
ना चाहत में कोई शोर हो, ना कोई गिला,
बस ख़ामोशी में दिल का अफ़साना हो।
इश्क़ वो नहीं जो लफ़्ज़ों में बयां हो जाए,
इश्क़ वो है जो सजदे में दुआ हो जाए।
जब दिल की हर धड़कन में उसका नूर जले,
तो हर सांस इबादत की अदा हो जाए।
ये इश्क़ सूफ़ियाना रूह को सुकून देता है,
हर दर्द में भी जीने का जुनून देता है।
नज़र झुके तो ख़ुदा का दीदार लगे,
हर चेहरा उसी का ही नूर देता है।
ना दूरी का डर, ना मिलने की आरज़ू,
बस उसके नाम से दिल महकता रहे।
ये इश्क़ सूफ़ियाना जब दिल में उतर जाए,
तो हर लम्हा इबादत सा चमकता रहे।
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)




