साहित्य

बागवान

उदय किशोर साह

खुशनशीब है  वो चमन जिनका होता है बागवान
बाल बांका ना कर पाता जो. बैरी हो सारा जहान
गुलशन की सुरक्षा में खड़ा है    वो ले तीर कमान
सुरक्षा की कवच बना दर पे   जब हो ये भगवान

बुढ़ा तन व बुढ़ा मन पर विचार है आज भी जवान
दिन रात पसीना बहाता है   पूरा करता है अरमान
हाथ में खुरपी कुदाली थामे इनकी है ये    पहचान
वो जन मूरख होते हैं जो ना देते इन्हें  मान सम्मान

इनके बदोलत सुरक्षित है   चमन तेरा वजूद ये मान
इनके परिश्रम का तूँ फल है जब होता है ये विद्यमान
माली के बिना ये जिन्दगी भटक जाती है हो गुमनाम
घर के चौखट पे बैठा है अनुभव       का हैं ये विद्वान

स्कूल कॉलेज की डिग्री नहीं है नहीं है कोई भी प्रमाण
पर अनुभव का खजाना समेटे वो है  साधारण इन्सान
मत भूलाना इनकी कुर्वानी ये हैं तेरे  भी एक कद्रदान
पढ़ा लिखा नहीं हैं फिर भी गुण से भरे हैं ये  गुणवान

बिना फीस की है अधिवक्ता देता है अच्छा  परिणाम
खतरे की बू आने का इनको होता है पूरा     अनुमान
हमारे लिये ये माली हमारा होता है साक्षात  भगवान
इनका हक है तुमसे पाने का पूरा जीवन मान सम्मान

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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