
तीसरी नवरात्रि माँ चंद्रघंटा बिराजे।
महाकाल रूप धर करती चमत्कार।।
सुर संत नर जन सब आरती उतारे।
भक्त करे माँ चंद्रघंटा की जयकार।।
सुधा- पाक रुची माँई भोग लगाओ।
मन हर्षित हो माँ करती है स्वीकार।।
शशि शिख धर मां चंद्रघंटा कहायो।
माता दुर्गा आये होके सिंह में सवार।।
चक्र गदा खड्ग त्रिशूल धारी माता।
हस्त, शंख,कमल धनुष तीर सँवारे।।
रौद्र रूप में हो महाकाली हो माता।
गिन- गिन के हो असुर कुल संघारे।।
करुणामयी हैं माँ दशभुजी भवानी।
गल रक्तपुष्प वस्त्र लाल करे श्रृंगार।।
दीन- हीन, मनु सुर संतन के रक्षक।
करना कृपा माँ नमन वंदन बारंबार।।
बसंत श्रीवास वसंत (नरगोड़ा)
रामकृष्ण मिशन आश्रम नारायणपुर
छत्तीसगढ़



