
जब मातृगर्भ निद्रा में था, रण-मंत्रों का गान सुना,
चक्रव्यूह प्रवेश विधा का, आधा केवल ज्ञान सुना।
भाग्य बीच में मौन हुआ फिर, कथा अधूरी रह पाई,
निकास-पथ की अंतिम वाणी, किस्मत ने न सुनवाई।
फिर भी तनिक न रुका वीर वह, रक्त जगा बलिदान लिए,
धर्मभूमि के पावन रण में, बढ़ा हृदय में प्राण लिए।
सिंह-शावक सा गर्जन करता, शत्रु दलों पर छाता था,
एक अकेला बालक होकर, रण का मान बढ़ाता था।
तीरों की झड़ी, घेरों का छल, नियम सभी बिसराए थे,
कई महारथी एक साथ उस बालक पर चढ़ आए थे।
यह कैसा रण? कैसी मर्यादा? कैसा क्षत्रिय मान रहा?
जहाँ अकेले वीर किशोर पर, झुंडों का अभियान रहा।
जब घायल होकर भूमि गिरा, धरती भी रो आई होगी,
माटी ने अपने आँचल से, पीर सहलायी होगी।
देवगणों की आँखों से भी, अश्रुधार बह आई होगी,
वीर शिशु की टूटी साँसें, दिशा-दिशा भर लाई होगी।
माँ सुभद्रा का हृदय तड़पकर, व्यथा सिंधु में डूबा होगा,
पार्थ सुनाकर शोक कथा को, अंतर पूरा टूटा होगा।
उत्तरा के सपनों का दीपक, अश्रु बन झर जाता था,
हर धड़कन में वियोग अग्नि का, शूल उतर जाता था।
पर इतिहास अमर यह कहता, तन भले धरा पर हार गया,
अभिमन्यु अपने साहस से, मृत्यु-द्वार भी मार गया।
अधूरी कथा सुनी थी जिसने, गाथा पूरी कर डाली,
क्षणिक आयु लेकर भी उसने, अमर विजय भर डाली।
आज भी जब अन्याय घिरे तो, मन साहस से भर जाता है,
एक अकेला वीर किशोर फिर, अभिमन्यु याद दिलाता है।
जहाँ कहीं भी धर्म पुकारे, उसका तेज चमकता है,
अधूरी कथा का वह नायक, युग-युग तक दमकता है।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




