
मोहब्बत में ऐसे भी मक़ाम आए
कि मेरी मौत हो और तुम इल्ज़ाम आए!!
नफ़रतों का शहर है जरा बचके चलिए
पता नहीं कौन किस वक्त बदल जाए!!
ज़िंदा ही नहीं मानते हम ख़ुद को
बाद मरने के चाहे सौ इल्ज़ाम आए!!
मोहब्बत में तेरा भी नाम आ गया
देखते हैं गुलशन में कब बहार आए!!
शहर के हालात खराब है बच के चलो
गांँव में रहते हुए हमको ये ख़्याल आए!!
मिटा चुका है हमको जमाना पहले ही
बचे कूचे है क्यों ना,इश्क़ के काम आए!!
वह अमीर है उनको सौ गुनाह माफ़
ग़रीब पर ना जाने कितने इल्ज़ाम आए!!
प्यार को दिल से महसूस करो मगर
कभी आईना भी देख लिया जाए!!
आजकल जमाना बहुत ख़राब है
कौन कब दुश्मन की नज़र में आए!!
दूर रहिए सदा दोस्तों से भी
क्या पता दुश्मनी के कब पैग़ाम आए..!!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




