आलेख

बीते लम्हे और आज का एहसास

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

​हवेली के उस पुराने मेहराबदार दालान में वक्त जैसे थम सा गया था। बाहर पेड़ों की घनी छांव से छनकर आती सुनहरी धूप ज़मीन पर यादों के नक्श बना रही थी। मेज़ पर रखी चाय की प्याली से उठता धुआं अतीत की धुंधली गलियों की तरह हवा में लहरें ले रहा था। साहब ख़ामोशी से सामने बैठी अपनी शरीक़-ए-हयात को देख रहे थे, लेकिन उनकी नज़रें बार-बार मेज़ पर रखी उस छोटी सी तस्वीर की ओर भटक जातीं,जो उनके युवा दिनों की थी।
​ साहब, जिनकी शख्स़ियत में हिकमत (बुद्धिमत्ता) और अदब (साहित्य) का एक गहरा संगम था, आज कुछ ज़्यादा ही सोच में डूबे थे। वह जानते थे कि वक्त के पास सब कुछ छीन लेने का हुनर है, लेकिन एक संवेदनशील इंसान के पास वह कला है कि वह गुज़रते हुए लम्हे को यादों की ज़ंजीर पहना कर हमेशा के लिए क़ैद कर ले।
​उन्होंने अपनी पत्नी की आँखों में झांकते हुए बहुत धीमे से कहा, “कितनी अजीब बात है ना? यह तस्वीर में दिखने वाला नौजवान… इसने बहुत से तूफ़ान देखे, कई कड़वे घूँट पिए, लेकिन इसने कभी हार नहीं मानी। जानते हो क्यों? क्योंकि इसके पास यादों का एक सरमाया (पूंजी) था और उम्मीद का एक क़लम।”
​उनकी पत्नी ने मुस्कुरा कर उनकी तरफ़ देखा। वह जानती थीं कि साहब इस वक्त केवल शब्दों की दुनिया में नहीं, बल्कि यादों के उस शहर में हैं जहाँ बीता हुआ कल आज भी सांस ले रहा है। उन्होंने साहब का हाथ थामते हुए कहा, “यह यादें ही तो हमें बताती हैं कि हमने कितना ख़ूबसूरत सफ़र तय किया है। ख़ूबसूरती उस लम्हे में नहीं थी जो गुज़र गया, बल्कि ख़ूबसूरती उस एहसास में है जो आज भी उसे याद करके दिल में जाग उठता है।”
​साहब ने मेज़ पर रखे कागज़ पर अपना क़लम उठाया। उनके लिए तस्वीर चेहरा दिखाती थी, लेकिन क़लम रूह का हाल बयान करता था। उन्होंने कागज़ पर बड़े सलीक़े से लिखा,
​”कितनी ख़ूबसूरत बात है ना कि गुज़रे लम्हों की याद हमें बताती है कि वो कितने ख़ूबसूरत थे।”
​उन्होंने महसूस किया कि उनकी पूरी ज़िंदगी, उनकी शायरी और उनकी मोहब्बतें दरअसल वही पुल हैं जो उनके अतीत और वर्तमान को आपस में जोड़े हुए हैं। वह पुरानी तस्वीर, वह आज की गुफ्तगू और वह ढलती हुई शाम,सब मिलकर एक ऐसी गज़ल बन रहे थे जिसका हर मिसरा (पंक्ति) शुक्रगुज़ारी और वफ़ा पर टिका था।
​शाम की उस गहरी खामोशी में साहब के चेहरे पर एक इत्मीनान था। उन्हें समझ आ गया था कि जब तक यादें ज़िंदा हैं, इंसान कभी तन्हा नहीं होता, और जब तक साथ निभाने वाला हमसफ़र पास हो, हर गुज़रा हुआ लम्हा आज भी मुस्कुराता हुआ महसूस होता है।

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
हरदा मध्य प्रदेश

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