साहित्य

धरा संरक्षण

वीणा गुप्त

पोखर ताल- तलैया  सूखे,
जंगल,पर्वत हुए नंगे-बूचे।
हरियाली को तरसे धरती,
भूमि बंजर, होती परती।।

हवा है दूषित ,घुटती श्वास,
कहाँ खो गई मलय वतास?
ले रासायनिक मलबा सारा,
हुई विषैली अमिय गंगधारा।

बैठी धरती ताप -तप्त हो,
जाने कब मेघा बरसा हो।
सागर भी मर्यादा भूला,
दिखलाता प्रलय की लीला।

प्राणवायु प्रतिपल कम होती,
ऋतुएं आएंँ न मनचीती।
सूनी अमराई ,न कोयल कूके,
वन्य -प्राणी बेघर और भूखे।

किया धरा का निर्मम दोहन,
अब भी भरा नहीं मानव मन।
जाग अरे ! अब जा तू संभल।
मत विनाश की राह पर चल।

फूल ,पत्तियाँ , कलियांँ सारी।
ईश्वर की अद्भुत कलाकारी।
इनको हमें  बचाना होगा।
ऋण धरती का चुकाना होगा।

तभी विकास की डगर मिलेगी ।
जब कांक्रीट में हरियाली हंँसेगी।
धूप ,पवन ,सलिल और पावक,
सभी बनेंगे जीवन -दायक।

विवेक चेतना का  संबल ले,
वसुधा की मुस्कान  लौटा दे।
प्रकृति की यह अनुपम थाती,
निज भविष्य के हाथ थमा दे।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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