आलेख

ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया

डॉ. शीलक राम आचार्य

1.) जोर जबरदस्ती करके 543 सांसदों की जगह पर 850 सांसद करना गरीब भारत पर एक बहुत बड़ा बोझ डालना है।543 सांसदों ने अपने संसदीय क्षेत्रों में विकास के अंतर्गत कौनसा तीर मार लिया है? गरीब भारतीयों पर टैक्स का खर्च और बढ़ जायेगा। इससे हरेक राज्य में विधायकों की संख्या भी 2500-3000 और अधिक हो जायेगी।बढे हुये सांसदों और विधायकों पर चुनाव,सुरक्षा,आवास, भोजन,फोन, गाड़ी, विदेशी सैर के साथ लूट-खसोट का खर्च भी तो बढ़ेगा।इसको कहां से भरा जायेगा? पहले जहां पर 543 लोग जनता के रूपये पर अय्याशी करते थे,अब उनकी संख्या 850 हो जायेगी। सिस्टम का जनता- जनार्दन की सुख- सुविधाओं पर न पहले ध्यान था,न सांसदों और विधायकों की संख्या बढ़ने पर कोई ध्यान रहेगा। यह संख्या वास्तव में कम होनी चाहिये ताकि कुछ लूट तो बंद हो।परिसीमन करने का विचार एक राजनीतिक हथकंडा है, जनता की सेवा से इसका कोई मतलब नहीं है। पहले गूंडों की संख्या कम थी तो परिसीमन के पश्चात् और बढ़ जायेगी। और दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि भारतीय लोकतंत्र में सांसदों और विधायकों में से अधिकांश आपराधिक रिकॉर्ड के होते हैं- इसके बावजूद भी संसद में कुछ शब्दों को असंसदीय घोषित कर दिया गया है। उनमें से कुछ शब्द हैं –
निरंकुश ,पापी,अधम,निर्लज्ज,नीच,निशाचर,असुर ,दानव,राक्षस ,छली,
धूर्त ,जुमलाजीवी, बालबुद्धि , अंट शंट, तानाशाह, जयचंद,धोखेबाज ,मक्कार,लोभी,
लालची , निकृष्ट कामुक ,छिछोरा ,व्यभिचारी , दुराचारी , स्वेच्छाचारी , खोटा ,कुटिल ,ढीठ , दुष्ट ,दुरात्मा ,नराधम ,पतित ,पाखंडी, पापिष्ठ ,पिशाच ,मलीन , भ्रष्ट , भ्रष्टाचारी , घिनौना ,घृणित ,हीन ,ठग, कपटी , क्रूर ,निर्दयी, स्वार्थी,विश्वासघाती , दगाबाज , फरेबी ,बेईमान ,बेहया , बेशर्म , बदकार , कमीना , कायर , लंपट , लुच्चा , लफंगा ,शैतान , चालाक ,झूठा आदि आदि।संसद में ये शब्द अशोभनीय माने गये हैं।एक सांसद दूसरे सांसद के लिये इनका प्रयोग नहीं कर सकता है। लेकिन आचरण और कार्यों को देखकर हकीकत तो यह है कि ये सभी शब्द जनता द्वारा चुने हुये उन प्रतिनिधि व्यक्तियों पर फिट बैठते हैं जो चुनाव से पहले वायदे करके चुनाव के बाद उन्हें भूला देते हैं। वायदाखिलाफ, चरित्रहीन, भ्रष्टाचारी, अपराधी, लूटेरे, शोषक और अनैतिक व्यक्तियों के लिये कौनसे शब्दों का प्रयोग किया जाये? उपरोक्त शब्द सूची के सिवाय अन्य कोई शब्द सूची शब्दकोश में उपलब्ध नहीं है।
2.) किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्ति के लिये अभ्यास,प्रतिभा और अनुशासन में से कौन सर्वाधिक सहयोगी बनता है। क्या ये तीनों मिलकर सफलता दिलवा सकते हैं? क्या कोई कोच, कोचिंग सेंटर और मोटीवेशनल स्पिकर इसकी गारंटी दे सकता है कि इन तीनों के सहयोग से सफलता मिल ही जायेगी? वास्तविकता यह है कि उपरोक्त के सहयोग से कोई भी सफलता की गारंटी नहीं दे सकता।एक और फैक्टर है जो उपरोक्त तीनों से प्रबल भी है तथा उसके बगैर ये तीनों कुछ नहीं कर सकते हैं। उसको तिकड़मबाजी,चापलूसी, रिश्वत, सैटिंग, लेन-देन, पहुंच आदि कुछ भी नाम दे सकते हैं। इसके सहयोग के बगैर प्रयास, प्रतिभा और अनुशासन किसी काम के नहीं हैं। किसी भी क्षेत्र में सफलता को आंख,नाक, कान, टांगें, बुद्धि देने का काम तिकड़मबाजी करती है
3.) अपने आपको गरीब कहते हैं लेकिन दिन में दस बार कपड़े, जुते घड़ी और चश्मा बदलते हैं – इसके लिये रुपया कहां से आता है? कहां से फंडिंग हो रही है?महंगे काजू,मटन,चिकन और गौमांस खाकर भूखे रहने का नाटक करके किसको बेवकूफ बना रहे हो? हजारों करोड़ के जहाज, करोड़ों की गाड़ियों और अरबों रुपयों के महलों का प्रयोग करके गरीबों का हितचिंतक कहते हुये इनका हृदय क्यों नहीं फट जाता है? जिनके घरों में पुरानी साईकिल,टूटे कप और सिल्वर के बर्तन भांडे होते थे,आज उनके घरों में फ्रांस, इटली, इंग्लैंड की क्राकरी भरी हुई है -इसके लिये धन की व्यवस्था किसने की है? इसका रहस्य बतलायेगा कोई? तीर्थ स्थानों में आयोजित कार्यक्रमों तक में स्विट्जरलैंड स्टाइलिश काटेज बन रहे हैं -आखिर इनके खर्च का भुगतान कहां से होता है?जिन कार्यकर्ताओं के पास फटे हुये कपड़े देखने को मिलते थे,आज उनके गले में मोटी मोटी सोने की चैन और हाथों की उंगलियों में महंगी अंगुठियों दिखलाई पड़ रही हैं – यह रुपया क्या पेड़ों से तोड़कर लाया गया है? कहां से लूटा है इतना रुपया? मंचों से गौमाता की जय लेकिन रसोई में गौमांस पकाकर खाते हो-इस तरह से सनातन धर्म का अपमान करने का ठेका तुम्हें किसने दिया है? महिलाओं के अधिकारों की बातें करते हो लेकिन तुम्हारे अधिकांश कार्यकर्ता, विधायक, सांसद, मंत्री तक बलात्कार और छेड़खानी के आरोपी हैं। कुछ तो विचार करो। कुछ तो तार्किक चिंतन करो। कुछ तो विवेक से काम लो। दलितों, पिछड़ों, वनवासियों, महिलाओं, राष्ट्रवाद,गाय, गंगा, गणेश, गीता की आड़ लेकर अपनी घटिया राजनीति करने का कुकृत्य कब बंद करोगे?
4.)एक और चमत्कार देखिये – सीरियल बलात्कारी ज्योतिषी बाबा अशोक खरात को जेल पहुंचाने वाले बिजनेसमैन डॉ. जितेंद्र शेलके और उनकी धर्म पत्नी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है।इसी दंपति की वजह से इस बाबा अशोक खरात को जेल जाना पड़ा था।दंपति की दुर्घटना में मौत होना बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रही है ।उम्मीद है कि ये बलात्कारी शीघ्र ही जेल से बाहर भी आ जायेगा और फिर इनके भक्त इनकी सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगे क्योंकि भक्त इन्हें दिल से प्यार करते हैं। नेताओं, अपराधियों, धर्मगुरुओं, सुधारकों, पूंजीपतियों, न्यायविदों और उच्च अधिकारियों की मदद के बिना इस तरह के नकली बाबा कुछ नहीं कर सकते हैं। इनके तार दिल्ली तक जुड़े हुये होते हैं। असली ताकत इन्हीं के पास मौजूद है। किसी बड़े स्तर के अपराधी, सत्ताधारी नेता,शोषक धर्मगुरु और इनके करीबियों के विरोध में आवाज उठाई तो ये तुम्हें इस धरती से उठाने की हिम्मत रखते हैं।पहले जिनको गलियों से गुजरते हुये कुत्ते भी भौंकते थे कि कौन अजनबी भिखारी आ गया -आज वहीं कड़ी पुलिस सुरक्षा में चमचमाती गाड़ियों के काफिले में घूम रहे हैं। कौनसे खजाने से आया है इतना रुपया? आपने इतना रुपया किस तरह कमा लिया है? कुछ समय में इतना रुपया कमाने का हूनर अन्य भारतीयों को भी बतला दो, ताकि वो भी अमीर बन जायें। कुछ तो शर्म करो।कुछ तो अपने देश के कल्याण की भी सोच लिया करो।
5.) अच्छे व्यक्ति अक्सर आर्थिक रूप से पिछड़े रह जाते हैं। अच्छे व्यक्ति अक्सर दुनियावी दौड़ में हार का मुंह देखते हैं, उन्हें जीत नसीब नहीं होती है। मानसिक संतुष्टि को कुछ देर के लिये छोड़ दीजियेगा। क्या बिना धन, दौलत, जमीन, जायदाद, नौकरी,घर और नौकरी के संसार में तरक्की होना संभव है? बिल्कुल भी नहीं। आपके पास नौकरी है,जमीन है, बैंक बैलेंस है, शहरों में प्लाट हैं – तो ही आपको समाज की तरफ से सम्मान मिलेगा। गरीब और असहाय
व्यक्ति का कोई सम्मान नहीं करता है। कहने को तो कोई भी कह देगा –
6.) अयोध्या,काशी, वृंदावन, जगन्नाथपुरी आदि सनातनियों के जितने भी बड़े बड़े तीर्थ स्थल हैं,उनको बाजार में बदला जा रहा है। कहां से कितना, कैसे और कब अधिक रुपया कमाया जा सकता है,सभी प्रयास इसी के लिये हो रहे हैं। तीर्थस्थलों से उपजे इस बाजार में धार्मिकता,संस्कार, संस्कृति, नैतिकता, मूल्यों का कोई स्थान नहीं है। सनातन धर्म और संस्कृति के तीर्थ-स्थलों को बाजारों, मंडियों और अय्याशी के अड्डों में बदला जा रहा है।अब तो ये तीर्थस्थल तीर्थस्थल न रहकर पर्यटक स्थल बनकर रह गये हैं। हालात इतने बिगड़ गये हैं कि अवैध संबंध रखने वाले जोड़े, हनीमून पर जाने वाले जोड़े और लिव इन रिलेशनशिप वाले जोड़े ही इन तीर्थ स्थलों पर जायेंगे।
7.)विकास का अर्थ जमीन से जुड़े हुये लोगों को उजाड़कर केवल अमीरों का विकास करना नहीं होता है। तीर्थस्थलों को बाजार में बदल देने का यह सारा खेल कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने के लिये होता है।भव्य महंगे भवन,दुकानें,शो रूम, होटल,लाज, सड़कें और क्लब बनाकर उस बाजार को बहुसंख्यक जमीनी लोगों के बुते से बाहर कर देना है। आखिर चाय, समोसा,पूडी,फल, सब्जी, प्रसाद बेचने वाला जमीनी दुकानदार लाखों करोड़ों में कैसे इनको खरीद सकता है?वह बेरोजगार सिस्टम से बाहर होकर अपने गांव को पलायन करने को विवश हो जाता है।इस तरह से तीर्थों के विकास की आड़ में गरीबों को मारकर मुट्ठी भर अमीरों का विकास किया जा रहा है। अयोध्या भगवान् श्रीराम और उनके मंदिर से पहले भी मौजूद थीं। काशी शिवजी और उनके मंदिर से पहले भी मौजूद थीं। मथुरा और वृंदावन श्रीकृष्ण और उनके मंदिर से पहले भी मौजूद थीं। सनातन धर्म के सभी तीर्थों को बाजारों में बदलकर इनके आध्यात्मिक महत्व को नष्ट करने का काम किया जा रहा है।इन तीर्थस्थलों पर आ रहे अरबों रुपए के चढ़ावे से सैकड़ों गौशालाएं, सैकड़ों विश्वविद्यालय, सैकड़ों योग केंद्र क्यों नहीं खोले जा रहे हैं? इससे वास्तविक रूप से सनातन धर्म,संस्कृति,दर्शनशास्त्र और प्रतीकों का महत्व जाना और समझा जाना संभव हो सकता है। लगता है कि सनातन धर्म को इसके हितचिंतक कहने वालों द्वारा ही इसका सर्वाधिक नुकसान पहुंचाने का काम किया जा रहा है।पद, प्रतिष्ठा,धन,दौलत और अय्याशी के प्रलोभन में धर्मगुरु भी सरेआम बिक रहे हैं।
8.) सनातनियों के बड़े तीर्थस्थलों पर पूजारियों द्वारा किस तरह से मंदिरों में प्रवेश और पूजा-पाठ के नाम पर श्रद्धालुओं से दुर्व्यवहार किया जाता है – यह सबको मालूम है। रिश्वत लेकर दर्शन करवाना और वीआईपी दर्शन की आड़ में तीर्थयात्री लूटे जा रहे हैं। इससे तीर्थस्थलों के प्रति आस्था में कमी आ रही है। इसके प्रति राजनीतिक और धार्मिक सिस्टम मौन धारण किये बैठा है। काफी तीर्थस्थलों का सरकारीकरण हो चुका है तथा काफी तीर्थस्थलों पर कुछ परिवारों का कब्जा है। लेकिन व्यवस्था के नाम पर केवल कुव्यवस्था दिखाई पड़ती है।इस प्रकार से तो सनातन धर्म और संस्कृति का प्रचार -प्रसार नहीं होगा।
9.) स्वामी दयानंद ने अपनी छोटी पुस्तक स्वमंतव्यामंतव्यप्रकाश में तीर्थ को परिभाषित करते हुये कहा कि जिससे दु:खसागर के पार उतरें कि जो सत्य भाषण,विद्या, सत्संग,यमादि, योगाभ्यास, पुरुषार्थ,विद्यादानादि शुभ कर्म हैं,उसी को तीर्थ समझता हूं,इतर जलस्थल आदि को नहीं। लेकिन आजकल सनातनियों के तीर्थों पर तो सरेआम पाखंड चल रहा है।विद्या, ज्ञान, तर्क, चिंतन,शुभ कर्म, पुरुषार्थ आदि कहीं भी देखने और जानने को नहीं मिलते हैं। कोई कुछ कहे तो भावनाओं को ठेस पहुंचाने के अपराध में मुकदमे दर्ज हो जाते हैं। धर्म, संस्कृति, अध्यात्म,योग और तीर्थ का मतलब पाखंड फैलाना तो नहीं होना चाहिये।
10.)अमरीका -इजरायल -इरान युद्ध को चलते हुये चालीस दिन हो चुके हैं। मूसलाधार बारिश की तरह पैसा हथियारों पर बहाया जा रहा है।इस फिजुलखर्ची कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति,संत, मुनि, योगी, धर्माचार्य, मौलवी, पादरी ज्ञान नहीं देगा कि यह सब अमानवीय है।चालीस दिन के युद्ध में चार लाख करोड़ रुपए हथियारों आदि पर खर्च कर दिये हैं।इस युद्ध में लगभग चार हजार मौतें हो चुकी हैं।यानि कि सौ करोड़ रुपए प्रति व्यक्ति को मारने के लिये खर्च हो चुका है। दुनिया का इससे बड़ा पागलपन अन्य कौनसा हो सकता है?यह पागलपन उच्च- शिक्षित लोगों द्वारा किया जा रहा है।हम विकसित युग में जी रहे हैं -यह सबसे बड़ा झूठ है। वास्तव में हम सदियों पुराने ईसाईयत और इस्लाम द्वारा निर्देशित मजहबी युद्धों के युग में जी रहे हैं। दुनिया से अथाह धनराशि लूटकर महंगे हथियार और आधुनिक सेनाएं तैयार करो तथा निर्दोष लोगों का खून बहाकर, लाखों घरों को बर्बाद करके, हजारों हस्पतालों और शिक्षा संस्थानों को नष्ट करके, हजारों सड़कों और पुलों को तोड़कर विजय प्राप्त करो।यह विकास नहीं अपितु ह्रास है, विनाश है। सैकड़ों देशों के अरबों लोग भूखमरी, बिमारी,बेघरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, हस्पतालों की कमी, शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की कमी, पौष्टिक भोजन की कमी, पेयजल और सिंचाई जल की कमी से जूझ रहे हैं। युद्धों में खर्च होने वाली धनराशि यहां पर खर्च क्यों नहीं हो सकती है? लगता है कि राजसत्ता, धनसत्ता,मजहब सत्ता और विज्ञान सत्ता आज भी युद्ध पिपासु,क्रूरात्मा,दानवी और राक्षसी लोगों के हाथों में कैद हैं।इतनी महंगी है मौत? हमारे यहां दुर्घटना में मौत पर दो लाख या पांच लाख का मुआवजा दिया जाता हैं और दूसरी तरफ अमरीका -इजरायल- इरान युद्ध में एक -एक मौत के बदले सौ सौ करोड़ रुपया प्रति व्यक्ति खर्च कर दिया है। तर्क, विचार,चिंतन,विवेक और समझ बिल्कुल गायब हैं।सौ- सौ करोड़ प्रति व्यक्ति खर्च करके जानबूझकर लोगों की हत्याएं की जा रही हैं लेकिन दुर्घटना में मरने पर कुछ लाख में मामला निपटा दिया जाता है। वैज्ञानिक रूप से विकसित दुनिया में यह हो क्या रहा है?कबीर ने कहा था -‘ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया।’ लेकिन यहां तो चादर पूरी तरह से दागदार है।इसे रखो या फेंको या आग लगा दो-कोई फर्क नहीं पड़ता।
……..
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!