साहित्य

कुछ दोहा मुक्तक 

डॉ गीता पाण्डेय

पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकजीवन दुष्कर क्यों हुआ, प्रकृति हुई लाचार।

इस पर मिलकर कीजिए, सब जन सोच विचार।

भूल गए पर्यावरण, करते रहे विकास,

सांँसे कम सबकी हुईं, रहते हैं बीमार।।

 

धन मद में फूले फिरें, घूम रहे आबाद।

हुए संस्कारहीन है, व्यर्थ करें संवाद।

कंकरीट के घर बने, वृक्षों को नित काट,

पेड़ लगाना भूल कर, फ्लैट रहा अब याद।।

 

बाढ़ कभी सूखा दिखे, आते हैं भूकम्प।

किए प्रदूषित जो धरा, इससे ही हड़कम्प।

हवा शुद्ध पानी नहीं, दूषित है परिवेश,

चलो सजाएंँ हम प्रकृति, धरा रहे निष्कम्प।।

 

स्वच्छ वायु छाया मिले, रखिए सब जन ध्यान।

वृक्षों को मत काटिए, इनमें बसती जान।

रक्षक है पर्यावरण, जीवन के आधार,

पांँच जून संकल्प लो, बदलो सकल विधान।।

 

पंचतत्व से है सजा, अनुपम प्रकृति स्वरूप।

स्वर्गिक सुषमा इस धरा, महिमा बड़ी अनूप।

दिवस आज पर्यावरण,सभी लगाओ पौध,

सभी करो श्रृंगार मिल, निर्धन हो या भूप।।

 

हरी भरी धरती रहे, पावन हो परिवेश।

चहुंँ दिशि रोपें पौध हम, दूर करें मांँ क्लेश।

वन उपवन सुंदर लगें ,मानस भी हो तृप्त,

दूर प्रदूषण हो स्वयं, रहे प्रफुल्लित देश।।

 

चलो लगाएँ वृक्ष हम,गली नगर हर गांँव।

हर आंँगन तुलसी सजे, पथ बट पीपल छांँव।

हरी-भरी धरती लगे, छाए बाग बहार,

कोयल कूके डाल पर, कौवा बोले काँव।।

 

प्रेम प्रकृति से हम करें, प्रथम यही कर्तव्य।

चलो संँवारे मिल सभी, मात्र न हो वक्तव्य।

निःस्वार्थ भाव देती हमें, जल वायु सब मुफ्त,

इसकी रक्षा हो सदा, गीता का मंतव्य।।

 

डॉ गीता पाण्डेय अपराजिता

सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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