
वचन नहीं कटु बोलिए, मधु सम वाणी राज।
और जगत के सामने, हो मीठी आवाज।।
कहते सच जगदीश हैं, जरा सोचिए आप।
जिह्वा मागे चाट तो, मिटे हृदय से ताप।।
जीभ स्वाद के अंग है, होती हैं चटकोर।
सबसे सच ही बोलिये, बोलो नहीं कठोर।।
जिह्वा लेती स्वाद सब, कहते हैं जगदीश।
खाते जब भी चाट हैं, सदा झुका कर शीश।।
कहीं गोल गप्पे दिखे, गली -गली हर ओर।
भीड़ इकट्ठा देख लो, खाते हैं चटखोर।।
डॉ जगदीश नारायण गुप्त
“जगदीश”
बनारस✍️✍️




