
मानव हो तुम खास बहुत हो,
दुनिया में कुछ खास लिखो,
नूतन सोच को विकसित कर,
तुम नूतन कुछ इतिहास लिखो।
महकें जिससे चहुँ दिशाएँ,
प्रीत का यूँ प्रसार करो,
पुष्प खिले हर एक बगिया का,
यूँ मधुरिम तुम हास लिखो।
नफ़रत से संसार भरा है,
मनुज अरि मानव का है,
दूर बहुत इंसा इंसा से,
तुम इनको कुछ पास लिखो।
जहर उगलती सबकी बोली,
वाणी कड़वी बहुत हुई,
वाणी में तुम घोल मधुरता,
प्रीत प्रेमयुत भाष लिखो।
नफ़रत दुश्मन मानवता की
तुम इसको फलने मत दो,
काम क्रोध और लोभ मोह का,
अंतर्मन से नाश लिखो।
✍️ नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।




