साहित्य

मजबूरी और मज़दूरी

रिया राणावत

मजबूरी और मज़दूरी इंसान की फितरत होती है प्यारे ,
कभी कोई तड़पाए तो कभी कोई रुलाए ।।
रास्ते आते है कठिन,
समय के साथ सब सुधार जाता हैं।
जाने क्यों लोग हमारी मजबूरी में दूर ,
ओर खुदकी मजबूरी पर करीब आते हैं।।
सब एक जैसे होते हैं,
दिखावा करते है ,
ओर दिखावा में उलझा जते है ।।
मजबूर बनाके ,
मजदूरी थमा देते हैं।
यह नहीं की ये थाम के हाथ हमारा ,
मुश्किल में मजबूर को मजदूर ना बनाए ।।
सोचेंगे की मजबूर है ,
तो मजबूत नहीं होगा ।।
मजदूर है,
तो कोई ग़म नहीं होगा ।।
उसकी स्थिति का मज़ाक उड़ाएं ,
ये पापी दुनिया के लोग कैसे बच पाएंगे।।
रो रहा है मजदूर ,
थक के बैठ गया।।
हारा नहीं है ,
पर हार गया।।
अब वो मजबूर भी है ,
पर कायर नहीं ,
इंसान भी है ,
पर निष्कपट भी ।
सारे राज़ जान कर ,
चुप हो जायेगा ।
इंसान की फितरत वो कहा छुपाएगा।।
इंसान होता है ,
मजबूर ओर मजदूर
एक ही समय पर ,
अब ये परेशानी ,
तू कैसे मिटाएगा ।।
बोल इन सब के होने के बाद ,
अब तू कहा जाएगा।।

– रिया राणावत
कालीदेवी,झाबुआ(मध्यप्रदेश)

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