साहित्य

मन को मैं समझाती हूँ!

मीना जैन

मन को मैं समझाती हूँ!
उदासियों की चादर मत ओढ़
जो दर्द बढ़ा दे, उन बातों को छोड़!
मन को मैं समझाती हूँ!
रख न अपने ऊपर कोई बोझ
रख साफ-सुथरी अपनी सोच!
मन को मैं समझाती हूँ!
चलता रहेगा शिकायतों का सिलसिला
भुला दे लाभ-हानि, क्या मिला न मिला!
मन को मैं समझाती हूँ!
समझने वाले तो कम ही होंगे
आलोचनाओं के बोल अधिक होंगे!
मन को मैं समझाती हूँ!
पर पीड़ा को बाँटने वाले विरले होते
अंदर से मलिन, ऊपर से जो उजले होते!
मन को मैं समझाती हूँ!
अधरों पर मुस्कान सजाए रखना
अपना दर्द अपने तक ही रखना!
मन को मैं समझाती हूँ!
चलना है उस देश अकेले
जहाँ न संगी-साथी, रेले!

मीना जैन
इंदिरापुरम, गाजियाबाद।

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