साहित्य

नहीं आना आंगन दोबारा (कहानी)

अभिलाषा श्रीवास्तव

“माँ क्यों करतीं हो किचकिच तनुश्री ठीक ही कह रहीं हैं ”

कहते हूए आभा ने माँ के हाथ पकड़ कर बैठा दिया व खुद किचन में सब्जी बनाने लगी तनुश्री भी चुपचाप अपने कमरे में चली गई लेकिन माँ का मन अशांत हो गया था बहू तो बहू अब शादीशुदा बेटी भी गलत कह रही थी आभा के शब्द माँ के मन को प्रभावित करने में तुल चुके थे

‘माँ क्यों करती हो किचकिच’

माँ ने घर के हर कोने कोने को निहारने लगी उस का घर अब कहीं खो गया था उसके परिन्दे उडान भर चुके थे व जो पास थे सब के सब अपने अपने गृहस्थी में थे उसका वह घर जिसके नींव के नीचे हजारों ख्वाहिश दफनाने थे या वह दरवाजा जिसके उपर उसने अपने पति रामेश्वरम जी के साथ मिलकर तोरण फूलमाला से कभी सुसज्जित किया था वह अब बेरंग नज़र आ रहें थे घर के अर्थव्यवस्था में दिमक लग गया था और हर दिन कोई न कोई कलेश अलग

बिटिया आई थी वह भी आज सुना डाली सोचते हुए वैदेही जी की आंखों से अथाह दर्दो का धार फूट पड़ा व खुद को संभालने में विफल हो गई थी

‘आखिर अयेसा क्या बोल दिया था जो बहू व बेटी दोनों ने कहा किचकिच करती हूँ मैं’

एक बार फिर से अतंस ने कहा

घर के मंदीर में सुखा पड़ा फूल था और ना जाने कब से ठाकुर जी की मुर्ति टकटकी बांधे हुए देख रहे थे की वैदेही कुछ पकवान मुझे भी भोग लगा दो,

माना रोज रोज नहीं लेकिन हफ्ते में एक दिन तो हलवा बनाके ठाकुर जी को भोग लगा सकते हैं बस हलवा बनाने के लिए हल्ला मच गया व आभा तो जानती थी लेकिन वह भी मुझे ही दोषी बना दिया सोचते हुए वैदेही पुनः भावनाओं में डूब के रोने लगीं बहू अपने कमरे में जोर जोर से हंस रहीं थी शायद उसके मायके से आनलाईन संवाद चल रहा था व आभा अभी भी रसोई में थी

आभा के बच्चे अब कम आते थे जब की तनुश्री अपने बच्चों को ज्यादा अपने कमरे में ही रखतीं थी ताकि वह गंवई या कल्चर से बचें रहे वैदेही सोचते हुए अब मौन के स्थिति में आ चुकीं थी व नज़र बंद कर के अपने कमरे में लेट गई थी तभी आभा ने प्रवेश किया उसके हाथों में हलवा और तुलसी के पत्ते थे भोग का प्रसाद लेकर आई थी और माँ के समीप रखते हुए बोलीं

“ठाकुर जी ने कहा है माँ को भी खिला दो”

“ठाकुर जी ने खा लिया”

सारे आंसू खो गए और एक गृहणी के भाव सामने आ गया

“हा माँ खा भी लिए व बोले है माँ से कहना की अब उसकी गृहस्थी नहीं है इसलिए परेशान ना हो बस मुझे बगियाँ से तुलसी के मंजरी लाकर दे दे वही पंसद है मुझे आखिर माँ के साथ साथ मैं भी बूढा हो गया हूँ”

माँ ने आभा को देखा तो उसे पहली बार लगा अब उसकी बिटिया बिटिया नहीं बल्कि एक सुलझी हुई बिटिया हो गई है उसके अंदर बहुत कुछ तुरपाई हो रहें थे लेकिन वह चुपचाप तुरप रहीं थी माँ के मन ने कहा

‘ आना नहीं आंगन दोबारा बिटिया’

अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर

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