साहित्य

पृथ्वी दिवस

नन्द किशोर बहुखंडी

धरा का मिल कर करें श्रृंगार।
वृक्ष लगाकर हजार और हजार।।

वही हरियाली प्रकृति को लौटा दें।
जैसे सौंपी थी ईश्वर ने हमें।।

पेड़- पौधे धरती के आभूषण।
सजती धरा मानो लगे दुल्हन।।

बदले में हवा का दें विस्तार।
संग में शीतल छाया पाएँ भरपूर।।

चलो संकल्प आज सब ले लें।
कभी न वृक्षों को काटेंगे।।

माना विकास जरूरी आज।
पर न हो वसुधा का उपहास।।

झरनों, नदियों की वही आहट होगी।
पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देगी।।

भूजल संरक्षित फिर होगा।
कोई प्यास धरा पे न होगा।।

नन्द किशोर बहुखंडी
देहरादून, उत्तराखंड

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!