
पिता को अब सुकून थोड़ा चाहिए,
माँ को भी शांत विश्राम चाहिए।
जीवन की इस कठिन उलझन से,
मुझको भी कुछ विराम चाहिए।
पुत्रों से न मिला सहारा कोई,
पुत्री का भी न प्रणाम चाहिए।
अपनों से जब मिले उपेक्षाएँ,
किसको फिर और सलाम चाहिए।
पत्नी ने भी न समझी पीड़ा,
कहाँ किसी का इल्ज़ाम चाहिए।
घायल मन की सूनी चौखट पर,
बस थोड़ा-सा आराम चाहिए।
छोटी नौकरी ही यदि अपराध है,
फिर किसका मुझे इनाम चाहिए।
रोटी, कपड़ा और सम्मान मिले,
न कोई ऊँचा मुकाम चाहिए।
जीवन भर सबके हित में जलकर,
अब न नया संग्राम चाहिए।
‘दिव्य’ थका है जग के मेले से,
बस प्रभु का पावन धाम चाहिए।
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*




