साहित्य

वृक्ष की ज़ुबानी

मुन्ना प्रसाद मुरली

रुको जरा संभलो मानव,
प्यार तो दे दो।
एक बार मुड़ कर देखो
एहसान तो कर दो।।

मुझमें क्या कमी आ गई जो,
मुझे काटने चला।
रखता हूं छांव में तुझे,फिर
क्यूं उखाड़ने चला।

दाता हूं तेरे जन्मों के
पानी तो पिला दो।
एकबार मुड़ कर देखो
एहसान तो कर दो।।

देता हूं शुद्ध हवा तुझे,
तू मुझे छलने चला।
ए सी कूलर के जाल मे
तू फंसने चला।

मैं वृक्ष हूं,तो वृक्ष मुझे
रहने तो दो।
सहरा हूं परिंदो की,
नीड बसने तो दो।।

लगाया तेरे पुरखों ने जो,
तू फल चखने चला।
बोया नही हैं, बीज तो,
क्यों ? काटने चला।।

रोयेगा तू पछताएगा,
मुझे रहने तो दो।
सूरज की किरणों को
जरा रोकने तो दो।।

तू जानता हैं परिणाम,
फिर काटने चला।
उजाड़ कर मेरा घर,
तू बसने चला।।

रुका हूं तो ,रुका हैं तू,
जरा खिलने तो दो।
कहता है मुरली मानव तू
जरा संवरने तो दो।।
एकबार मुड़कर देखो
एहसान तो कर दो।।

मुन्ना प्रसाद मुरली
शिक्षक सह कवि
रा. मा. वि. सरॉव दिनारा
रोहतास बिहार 802218

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