साहित्य

पानी बिन सब सून

पूर्णिमा सुमन

१. पानी की महिमा अगाध, जग का है आधार।
बिन जल जग है शून्य सा, व्यर्थ हुआ संसार॥

२. बूँद-बूँद सँभाल ले, कर ले नेक जतन।
कल को जल के बिन सुत, तरसोगे धन॥

३. नदियाँ सरोवर भर रहे, प्रकृति का उपहार।
आदर इसका कीजिए, पावन इसकी धार॥

४. मैला इसको मत करो, छोड़ो यह व्यवहार।
दूषित जल के अंत से, मिटेगा ये संसार॥

५. बिन पानी देह की, सांसों का क्या काम?
जल ही जीवन है सदा, करता सफल काम॥

६. तरुवर सब हैं मर रहे, जल के बिन बेहाल।
जल से धरती खिल गई, आई है बहार॥

७. आज घड़ा खाली खड़ा, कल का सोचो मान।
जल संकट जब आएगा, खो जाएगी जान॥

८. जल ही अमृत मान तू, जल है अपना नीर।
रक्षा इसकी कीजिए, मिटे सकल सब पीर॥

९. दिशा-दिशा ये कह रही, वेद करे बखान।
जल सहेजो प्रेम से, हो जग का कल्याण॥

१०. मूल्य समझ तू जल का, मत करना अपमान।
सुमन कहे यह मान तो, बच जाए जहान॥

पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद

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