
खोकर तुम मुझे कभी पा ना सकोगे जीवन में
हम तुम्हें वहाँ मिलेगें जहाँ तुम आ ना सकोगे
ढुँढते रह जायेगी तेरी नीली नीली आखें हमें
पर तुम्हें हम कहीं धरा में नजर ना आ पायेगें
मेरी चाहत को तुम मेरी मजबूरी ना समझना
मेरे दिल में तेरी चाहत की अरमान संजोये बैठा है
मेरी मोहब्बत को मजाक समझने वाले तुमको
एक दिन खुद की भूल की अहसास समझा देगी
कभी अकेले में अपने अन्दर झाँक कर देख लेना
जहाँ तेरे दिल की धड़कन् में मेरी प्यार स्पंन्दन करता मिलेगा
कभी अपने जेहन में उतर कर टटोलना अपने आप को
एक धुंधली सी अक्स की झलक तुम्हें मुस्कुराते मिलेगा
ये प्यार दो जिस्म की भौतिक सुख नहीं है मेरी जान
ये मिलन पावन सुबहा की तरूणई बेला की फलक है
दिन ढ़ल जाये तो देखना उस सागर की ओर एकबार
जहाँ धरती और अंबर साथ साथ डुबने को मजबूर होता है
जज्बात की तुफान जब जंगल में उठ चुकी है इस जन्म में
उस आग को तुम कैसे बुझा पायेगी की अमावश रात में
जो बदरा सावन में आँसू बहाते तुम ने भी देखा है कभी
फिर कैसे समझा पाओगी उस बरसात को इस रात में
जीवन की अन्तिम पहर में भी प्रीत की दीप जताये बैठा हूँ
ताकि इस अंधेरी रात में मेरे जज्बात की राशनी तुम्हें दीख जाये
पलकें बिछाये बैठा रहूंगा तेरे प्यार की राहों में मेरी जान
जब तेरे दिल की तुफान तुम्हें आने को कर दे मजबूर आ जाना
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार




