प्रयागराज के व्यंग्यकार जयचन्द प्रजापति ‘जय’ : बिम्बों के जादूगर
दि ग्राम टूडे/संवाददाता

प्रयागराज। प्रयागराज की धरती ने एक बार फिर हिंदी व्यंग्य को नई धार दी है। जयचन्द प्रजापति ‘जय’ अपनी तीन मारक रचनाओं—’खामोश हो गयी ठहाका’, ‘हाय रे, मेरा पांच साल’ और ‘चीलर सफेदपोश बना रहता है’—के जरिए राजनीति, प्रशासन और समाज के तीनों स्तंभों पर तीखा प्रहार कर रहे हैं।
साहित्यिक विश्लेषकों के मुताबिक, ‘जय’ जी का व्यंग्य ‘टारगेटेड’ है। ‘हाय रे, मेरा पांच साल’ में चुनावी ‘शीशी-वोट’ लोकतंत्र पर चोट, ‘चीलर सफेदपोश’ में संस्थागत भ्रष्टाचार और ‘कुनबा कल्चर’ पर तंज, तथा ‘खामोश हो गयी ठहाका’ में भावनात्मक क्षरण की मार्मिक पड़ताल। ठेठ अवधी-हिंदी की देसी भाषा, जैसे ‘पूंछ उखड़ गई’ या ‘लाल-पीला दिखना’, संगम किनारे की चाय दुकानों से निकली लगती है।
परसाई-शरद जोशी की परंपरा में ‘जय’ जी बिंबों के जादूगर हैं—भ्रष्टाचार को ‘चीलर’ बना देते हैं, जो पाठक को खुद सोचने पर मजबूर कर देता है। उनकी शैली किस्से से शुरू होकर ‘पंच’ पर खत्म होती है, जैसे “तू मेरा पांच साल बर्बाद कर रहा था, मैंने तेरा पांच साल बर्बाद कर दिया”। आम आदमी के पक्षधर ये व्यंग्यकार निर्भय हैं—नेता, गुटबाजों और परजीवियों पर हंसिया चलाते हैं।
परसाई का फलक राष्ट्रीय था, भाषा परिष्कृत; ‘जय’ जी का जमीनी और कच्चा-देसी। विश्लेषक कहते हैं, शिक्षा, चिकित्सा और डिजिटल भारत जैसे नए क्षेत्रों में उनकी कलम और धारदार हो सकती है। प्रयागराज ने अकबर इलाहाबादी से परसाई तक व्यंग्य दिए, अब ‘जय’ जी ‘चीलर’ और ‘शीशी’ जैसे बिंबों से इसे आगे बढ़ा रहे हैं।
जब तक व्यवस्था में ‘चीलर’ रहेंगे, ‘खौलता पानी’ मांगने वाली ऐसी कलमों की जरूरत बनी रहेगी।




