
आज पृथ्वी दिवस है
कहीं जल रहे जंगल
कहीं जल रहे उपवन
कहीं धधक रहे कारखाने
कहीं उबल रहे नदी धारे
कहीं कट रहे जंगल
नदियों का शांत स्वर
शांत है झरनों का स्वर
कहीं कभी अतोल जल
तो कहीं सूखी पड़ी है धरा
तालाब सूखे सूखे नौव धारे
नदियां सुखी सुखे नदी गधेरे
अब तो चेत रे मानव
मत कर अपने लिये अधेरा
कहीं उजड़ रहे उपवन
इस अंधी दौड़ में सब कुछ
हवन कर रहे धरा पर
सूरज धधक रहा धरा पर
चाँद छोड़ चुका शीतलता अपनी
हम करते जा रहे हैं मनमानी
नहीं सुन रहे हम इस धरा की
आर्त पुकार और इशारा
धुवा ही धुवा है इस धरा पर
कहीं जंगल में लगी आग का
कहीं कारखानों से निकलती गैस का
कहीं रोड से उड़ता धुवा
तो कहीं कटती रोड का
बचा लो इस धरा को अभी भी
नन्द किशोर जोशी
वापी गुजरात
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