
पुस्तक सच्ची मित्र हैं, खुशियों का आधार।
इनमें ही मिलता सदा, जीवन का सब सार।।
खोज हुई कागज तभी, मिलकर बनी किताब।
सदियों से सब लिख रहे, लेखन विविध हिसाब।।
अनपढ़ पुस्तक देखता, क्या समझे अनजान।
लगता चक्रव्यूह सम, लेखन का यह ज्ञान।।
मन में करें विचार वह, अक्षर का भंडार।
पढ़-लिख कर साक्षर बनूंँ, सुंदर यह संसार।।
भूतकाल जो भी घटा, मिलता है उल्लेख।
पड़ी जरूरत जब कभी, इनमें ही सब देख।।
कालिदास दिनकर सहित, सबने लिखे विचार।
तुलसी रामायण लिखी, अंतस ईश निहार।।
आदि ग्रंथ अध्यात्म के, कहलाते हैं वेद।
संस्कारों का धन मिले, दूर सभी हों भेद।।
भांति-भांति शिक्षा मिले, यही ज्ञान का पुंज।
विद्या बुद्धि विवेक का, अंतहीन ये कुंज।।
सुशीला फरमानिया ‘दीप्त’
संबलपुर, ओडिशा



