साहित्य

पुस्तक समीक्षा : अंचल का स्वर है “साधना के स्वर”

-डॉ. विवेकानंद उपाध्याय

“सहितस्य भावम साहित्यम”!कल्याण का भाव ही साहित्य है!सरस्वती ओम शव्द के साधना की देवी है!संगीत की देवी है!साहित्य की देवी है!शव्द उनकी सहिता है!इसलिए शव्द उनका संसार है!शव्द कभी मरते नहीं!ओम के महाविस्फोट से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का विकास हुआ!सरस्वती के बीणा के तार अलग -अलग होते हुए भी एक सुरु मे बजते है और सजते है!वाणी शब्दो से सजती है!जब तक वीणा के तारों को नहीं छेड़ा जाता तब तक संगीत पैदा नही होता!ध्वनि ही शव्द है ध्वनि की सतत साधना ओम के माध्यम से करने पर स्वर की लहरिया उदभुत होती है!सरस्वती के हाथो मे तीन अद्भुत अस्त्र है!पहला वीणा, दूसरा माला और तीसरा-पुस्तक!वीणा सरस्वती, माला निरंतरता व सतत साधना और पुस्तक ज्ञान का धोतक है!लेखक-संपादक डॉ. ओमप्रकाश शुक्ल की पुस्तक “साधना के स्वर”इन्ही सभी साधना स्वरों का विलक्षण संगम है!

आंचलिक पृष्ठभूमि पर आधारित प्रख्यात उपन्यासकार /कथाकार फनिश्वर नाथ रेणु की विश्वविख्यात रचना ‘मैंला आंचल” के सदृश्य डॉ. ओमप्रकाश शुक्ल ने अपनी पुस्तक “साधना के स्वर” मे समाज के स्वरुप अपने शव्दो मे महिमामंडित कर अपने शुक्ल वंश एवं अंचल को पुस्तक का केंद्रीय विषय बनाया है!प्रस्तुत पुस्तक को श्रद्धांर्चन,, तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि, देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर जनपद की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि,साधना पथ के अप्रतिम नायक सहित पांच खंडो मे बिभाजित कर साहित्य, संस्कृति, धर्म, अध्यात्म, इतिहास, शख्सियतो पर तफ़सील से व्याख्या लेखनीकारों ने किया है!पुस्तक के प्रारम्भ मे ही डॉ. उपेन्द्र प्रसाद का “दो शब्द”पुस्तक की पूरी मीमांसा प्रस्तुत कर देता है!पुस्तक की लम्बी भूमिका मे वेदों, पुराणों, उपनिषदो और गीता को उद्धरित करते हुए बरहज आश्रम के पीठाधीश्वर श्री आँजनेयदास ने लिखा है कि “यह पुस्तक सामाजिक सदभाव, समरसता एवं कौमी एकता की उद्भुत मिसाल कायम करने मे समर्थ होंगी!”जो सही मायनो मे सच भी है जैसे कर्नल सुधांशु शुक्ल का “मानवता ही मेरा धर्म “डॉ. संजय यादव का “मस्तमौला फकीर कवीर का ढाई आखर प्रेम का”डॉ. विवेकानंद उपाध्याय का बरहज के सूफ़ी संत बाबा बरहना पर “सबके बाबा बरहना”आलेख मे बाबा के उद्भव और अवसान के साथ ही प्राचीन से लेकर अर्वाचीन तक बरहज का इतिहास शोधपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करते हुए बरहज आश्रम के तृतीय पीठाधीस्वर सत्यव्रत जी पर “सत्यव्रत सत्य पर….”शिर्षक से पेश कर सराहनीय कार्य किया है!पुस्तक मे बरहज आश्रम के संत परम्परा का लम्बा इतिहास वर्णित है!अपने लम्बे संपादकीय और अन्य आलेखो मे डॉ. ओमप्रकाश शुक्ल ने अपने गर्ग वंश का इतिहास, ब्रह्म भोरानाथ शुक्ल का जीवन बृत एवं साधना का स्वरुप बताते हुए देवरिया की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, पुरातत्विक पृष्ठभूमि को रेखाकित करने का सफल प्रयास किया है!श्रीमती स्वधा शुक्ला “सीनू”, हिमांशु शुक्ल, श्रीमती कृतिका शुक्ला, जयप्रकाश शुक्ल आदि लेखकों ने ब्रह्म भोरानाथ के चमत्कार भरे संस्मरणों को प्रस्तुत कर किताब को रोचक बना दिया है!अंचल के ख्यातिलब्ध शख्सियतो का सचित्र जीवन परिचय के साथ ही प्राचीन धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक स्थलों का सचित्र परिचय देकर पुस्तक को रुचिकर बना दिया गया है जो इसके बारे मे जिज्ञासा रखने वाले पाठको की जिज्ञासा को शांत करने का कार्य करेगा!पुस्तक के अंत मे दो विद्वान लेखकों डॉ. ओमप्रकाश शुक्ल की पुस्तक “सतत विकास की ओर”, और डॉ. विवेकानंद उपाध्याय, डॉ. संजय यादव की पुस्तक ” स्मृति मे है जीवन”की समीक्षा क्रमशः डॉ. विवेकानंद उपाध्याय और डॉ सुमित्रा शर्मा ने प्रस्तुत कर किताब मे चार चाँद लगा दिया है!पुस्तक मे लेखकों की भाषा सहज, सरल और सुबोध है पुस्तक का कलेवर और छपाई सर्वोत्कृष्ट है!संपादक ने भाषा त्रुटि न हो इस पर विशेष ध्यान दिया है इसलिए भाषा की त्रुटि न्यून है!इसके लिए वह साधुवाद के पात्र है!

साधना चाहे आध्यत्मिक हो अथवा साहित्य जाग्रत, प्रशासनिक, राजनीति या विज्ञान के क्षेत्र की हो, उसमे स्वर प्रसफुटित हो जाते है और समाज को गति मिलती है!साधना ऊचाई पाकर बोलने लगती है!क्षेत्रीय पृष्ठभूमि पर आधारित यह पुस्तक निश्चित ही वर्तमान युवा पीढ़ी का मार्गदर्शन करने मे सफल होंगी!

 

पुस्तक- साधना के स्वर

लेखक/संपादक- डॉ. ओमप्रकाश शुक्ल

प्रकाशक – स्वराजलि प्रकाशन, गाजियाबाद, (उ.प्र.)

पृष्ठ – 240

मूल्य -540

प्रकाशन वर्ष – 2025

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