
22अप्रैल को भू अलंकरण दिवस पर
कुशल चित्रकार यह धरा हमारी,
इस पर कॉन चितेरा भरेगा रंग।
कोई वो रंग शेष नहीं है अब,
जिससे न सजा हो धरा का अंग। ।
श्वेत,गुलाबी, नीले ,पीले, लाल,
भांति भांति के खिले हैं फूल।
हरी भरी हैं वृक्षों की पाते,
जल से भरे सरिता के कूल ।।
सघन सघन गिरि उच्च खड़े,
बनकर के भारत के प्रहरी।
मलयागिरी की सुरभित पवन,
बिखराती है चंदन की लहरी।।
सोंधी सोंधी मिट्टी की खुशबू,
महके जब वर्षा की पड़े फुहार।
और देखकर गेहूं की बाली,
झूम झूम कृषक गाए मल्हार।
वितान तना है गगन का जिस पर,
जिससे मचले धरा का अंग अंग।
बोलो कुंदन सी ऐसी वसुधा में,
कॉन चित्रकार भर पाए रंग।।
इसके रंग हैं इसका संरक्षण,
और हरीतिमा का संवर्धन।
सौंपे हम इसे ,इसके वृक्ष पौधे,
तो हो जायेगा भू अलंकरण।।
ममता श्रवण
अग्रवाल
साहित्यकार
सतना ८३१९०८७००३




