साहित्य

सुरों की मलिका — आशा भोसले

डॉ संजीदा खानम शाहीन

सांगली की मिट्टी से उठी एक आवाज़,
नौ साल की उम्र में थामा जिसने साज़।
पिता का साया सिर से उठ गया,
पर सुरों का दीपक कभी बुझा नहीं।

‘चला चला नव बाळा’ से जो सफर शुरू हुआ,
‘चुनरिया’ में ‘सावन आया’ कहकर बरस गया।
गीता-शमशाद के दौर में रास्ते ढूँढे,
फिर ओ.पी. नैय्यर संग तूफान बनकर उभरी।

बारह हज़ार गीतों की माला गूँथी,
बीस ज़ुबानों में जादू बिखेरा।
कभी ‘पिया तू अब तो आजा’ की अदाएँ,
कभी ‘दम मारो दम’ का नशा घोला।

ग़ज़ल में दर्द, कव्वाली में जोश,
वेस्टर्न में बिजली, भजन में भक्ति।
हर रंग में ढली, हर ढंग में सजी,
आशा ताई की आवाज़ — सुरों की बस्ती।

लता की बहन, पंचम की हमदम,
फिर भी अपनी अलग पहचान गढ़ी।
छाया से निकलकर धूप बनी,
हर दिल के रेडियो पर खुद बजी।

नौ दशक की उम्र, पर आवाज़ जवान,
‘आशा’ नाम है, उम्मीद की पहचान।
जब तक संगीत रहेगा इस जहाँ में,
गूँजता रहेगा आशा ताई का नाम।

मौलिक,स्वरचित
डॉ संजीदा खानम शाहीन

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