
बेबस निगाहों से ये दुनिया सही नहीं जाती,
भूखे बच्चों की सिसकी सही नहीं जाती।
क्यों राख हो रही हैं उम्मीदों की झोपड़ियाँ,
माँ से जवान बेटे की चिता सही नहीं जाती।
सूनी हथेलियों की लकीरें भी रो पड़ीं,
मजदूर की टूटी हुई तकदीर सही नहीं जाती।
हर मोड़ पर दर्द का मंजर खड़ा मिला,
इंसान से इंसान की तौहीन सही नहीं जाती।
कब तक दबेगा सच ये सियासत के शोर में,
जनता से अश्कों की नदी सही नहीं जाती।
अब वक्त है बदल दो ये हालात दोस्तों,
धरती से इतनी बड़ी बदहाली सही नहीं जाती।
कुछ अश्रुओं की पुकार, कुछ टूटे दिलों का साज़,
जन-जन की पीड़ा कहती है – वेदना की आवाज़।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




