
राज मन के बताने, पर बता ना सके हम।
जख्म दिल के दिखाने पर दिखा ना सके हम।
पतझड़ सी वीरान हो चुकी है जिंदगी,
बसंत आता है पर बहार नहीं आती।
वीरान है आज, हवाओं की सोख वादियां।
गुमनाम सी हो गई है सारी आबादियां।।
हैरान हूं,मैं यह सब देखकर।
इसलिए
पूछ लिया खुद को ही रोककर।।
हुआ है आखिर,ऐसा क्यों?
खो गया है बचपन जाने क्यों?
शायद!
वह पल नहीं रहा।
वह चौपाल,वह कल नहीं रहा।
वह गांव ना रहा,
वह लगाव ना रहा।।
अल्हड़पन जीवन से,सरोकार ना रहा।
इसलिए
वीरान है आज, हवाओं का रुख।
दे रही है,जो चांद को दुःख।।
पर,हसरत है मेरी,
दिन वो वापस आये।
जो सभी के मन है बहुत लुभाए।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




