
नीली धरिणी नीला सागर,अरु नीला आकाश।
सदा सहेजो इन सबको प्रिय ,वरना जगत् विनाश।।
मत काटो तरु-डाली-डाली,करती प्रकृति विलाप।
दूषित जो कण-कण है होता,बन जाता अभिशाप।।
पृथ्वी माँ दे जीवन सबको,वह ही देती श्वास।
शरण वही सबको लेती है,जीव सभी हो खास।।
दूर रखो नित दूषण से क्षिति,कर लो माँ से प्यार।
ध्यान सभी का वह रखती है,मिला यही बस सार।।
कुंडलिया
तोड़े दम पृथ्वी यहाँ,करो बचाव उपाय।
प्राणवायु,तरु खो रहे,चुप देने में राय।।
चुप देने में राय,हुआ है जल भी दूषित।
उखड़ रही क्षिति श्वास,प्राण दे करो विभूषित।।
औषधि भू के वृक्ष,यही जीवन दे जोड़े।
आशा का संचार,सभी बाधा को तोड़े।।
वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी




