
ये अलार्म न होता क्या हम सुबह उठ पाते,
नींद के मीठे सपनों में ही दिन को बिताते।
न काम पर जा पाते, न टाइम पर खा पाते,
जीवन की दौड़ में हम कैसे आगे बढ़ पाते।
टिक-टिक की धुन में एक जिम्मेदारी छुपी है,
हर सुबह की शुरुआत में नई कहानी लिखी है।
ये छोटी सी घंटी हमें राह दिखा जाती,
सुस्ती की चादर को धीरे धीरे हटाती।
कभी लगता है ये कितना हमें सताता है,
पर सच कहो तो यही जीवन संवार जाता है।
हर बीप में छिपा एक नया सवेरा होता,
हर जगने वाले को एक सुनहरा मौका देता।
तो मान लो इसको अपना सच्चा साथी प्यारा,
जो हर दिन देता है जीवन को नया इशारा।
अलार्म की आवाज में छिपी है ये बात,
जागो, बढ़ो आगे यही है जीवन की सौगात।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




