आचार्य धीरज द्विवेदी ‘याज्ञिक’ : ज्ञान, सेवा और सनातन संस्कृति के संवाहक
डाॅ.शिवेश्वर दत्त पाण्डेय

भारतीय संस्कृति में संत, आचार्य और ऋषि-मनीषियों की परम्परा सदैव समाज को दिशा देती रही है। ऐसे ही युगपुरुषों में पूज्य आचार्य धीरज द्विवेदी ‘याज्ञिक’ जी महाराज का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। वे केवल एक कथा-वाचक या कर्मकाण्ड विशेषज्ञ नहीं, बल्कि शिक्षा, सेवा, धर्म प्रचार और साहित्य साधना के माध्यम से समाज निर्माण में निरंतर योगदान देने वाले कर्मयोगी संत हैं। उनका संपूर्ण जीवन सनातन संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के लिए समर्पित है।

आचार्य धीरज याज्ञिक जी का व्यक्तित्व ज्ञान और विनम्रता का अद्भुत संगम है। वर्तमान समय में जब शिक्षा का व्यवसायीकरण बढ़ रहा है, तब उन्होंने निःशुल्क गुरुकुलों के माध्यम से वैदिक शिक्षा की प्राचीन परम्परा को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है। उनका 108 गुरुकुलों की स्थापना का संकल्प न केवल शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण पहल है, बल्कि भारतीय ज्ञान परम्परा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक विराट अभियान भी है। गुरुकुलों में विद्यार्थियों को वेद, संस्कृत, संस्कृति और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें आदर्श नागरिक बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

धर्म प्रचार के क्षेत्र में भी आचार्य श्री का योगदान उल्लेखनीय है। वे निर्धन एवं जरूरतमंद लोगों के लिए निःशुल्क श्रीमद्भागवत कथा, श्रीराम कथा तथा धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन करते हैं। उनका मानना है कि ईश्वर का संदेश केवल संपन्न वर्ग तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए। इसी उद्देश्य से वे गाँव-गाँव और घर-घर तक हरि-कथा का अमृत पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं। उनके द्वारा आयोजित कथाएँ केवल धार्मिक आयोजन नहीं होतीं, बल्कि सामाजिक जागरण और नैतिक चेतना के केंद्र भी बनती हैं।

समाज सेवा के क्षेत्र में भी उनका योगदान प्रेरणादायक है। उन्होंने अनेक निर्धन परिवारों की सहायता की है तथा चार निर्धन कन्याओं के विवाह संपन्न कराकर समाज के सामने सेवा का आदर्श प्रस्तुत किया है। कन्यादान को भारतीय संस्कृति में महादान माना गया है और आचार्य श्री ने इस परम्परा को सार्थक रूप प्रदान किया है। इसके अतिरिक्त वे शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में भी जरूरतमंदों की सहायता करते रहते हैं। उनके लिए मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है और यही भावना उनके प्रत्येक कार्य में दिखाई देती है।
आधुनिक तकनीक का सकारात्मक उपयोग करते हुए आचार्य जी प्रतिदिन रात्रि 8 से 9 बजे तक ऑनलाइन सनातन धर्म की शिक्षा भी प्रदान करते हैं। यह प्रयास उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रहा है जो किसी कारणवश प्रत्यक्ष सत्संग में उपस्थित नहीं हो पाते। उनके प्रवचन सरल, सहज और जीवनोपयोगी होते हैं, जिनसे युवा पीढ़ी भी धर्म और संस्कृति के प्रति आकर्षित हो रही है।
आचार्य धीरज याज्ञिक जी निष्काम कर्मयोग के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। कथा और यज्ञ से प्राप्त दक्षिणा का उपयोग वे धर्म एवं समाज सेवा के कार्यों में करते हैं। उनका जीवन सादगी, त्याग और समर्पण की भावना से परिपूर्ण है। वे सदैव इस बात पर बल देते हैं कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि सेवा, सदाचार और परोपकार भी धर्म के अभिन्न अंग हैं।
धार्मिक क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों में 41 मंदिरों में प्राण-प्रतिष्ठा कराना भी एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसके माध्यम से उन्होंने अनेक क्षेत्रों में धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को सशक्त किया है। यज्ञ, अनुष्ठान और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से वे भारतीय संस्कृति के मूल्यों को समाज में स्थापित करने का सतत प्रयास कर रहे हैं।
साहित्य के क्षेत्र में भी आचार्य श्री की विशिष्ट पहचान है। वे एक संवेदनशील लेखक, चिंतक और कवि हैं। उनके लेख धर्म, समाज और संस्कृति से जुड़े विषयों पर गहन चिंतन प्रस्तुत करते हैं। उनके काव्यपाठ में आध्यात्मिकता, राष्ट्रभावना और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। यही कारण है कि उन्हें विभिन्न धार्मिक, सामाजिक और साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
वर्ष 2011 में काशी विद्वत परिषद द्वारा उन्हें प्रदान की गई ‘याज्ञिक’ उपाधि उनकी विद्वत्ता, यज्ञनिष्ठा और शास्त्रज्ञान का प्रमाण है। यह सम्मान उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की गरिमा को और अधिक प्रतिष्ठित करता है।
निस्संदेह आचार्य धीरज द्विवेदी ‘याज्ञिक’ जी महाराज का जीवन ज्ञान, सेवा, भक्ति और कर्म का प्रेरक संगम है। वे सनातन संस्कृति के सच्चे संवाहक, समाज के पथप्रदर्शक और धर्म चेतना के सशक्त स्तंभ हैं। उनका व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा तथा उनके द्वारा किए जा रहे कार्य भारतीय संस्कृति की जड़ों को और अधिक सुदृढ़ करते रहेंगे।




