
हम मिट्टी के लोग हैं बाबू
मिट्टी से उठ के हम आये हैं।
नहीं हमारा किसी से झगड़ा
किसी से नहींं है कोई रगड़ा।
हम लेकर अपने सपने बाबू
शहर में हम चल के आये हैं।
नहीं है बाबू कोई अदा हमारे
नहीं है कोई हाव-भाव हमारे।
नहीं चाहिए हमें चांद सितारे
नहीं चाहिए हमें हीरा- मोती।
हमें चाहिए सोने को बिस्तर
खाने को चाहिए रोटी भरपेट।
नहीं है कोई नखरा बाबू
नही है कोई अदा हाव-भाव।
यही हमारे जीवन की राह रे
यही हमारे जीवन की चाह रे।
हम सब मिट्टी के लोग हैं बाबू
हम मिट्टी से उठ के आये हैं।।
डॉ जगदीश नारायण गुप्त “जगदीश”
बनारस✍️✍️




