
वक्त की धूप – छांव की तरह,
रंग हमारे भी बदलते हैं।
हालात की हवाओं क़े संग रिश्तों के अर्थ मचलते हैं।
बचपन में माँ – बाप ही हमारी पूरी दुनिया होते हैं।
उनकी उंगली थामे हम,हर डर से हम बेखौफ होते हैं।
फिर जीवन की राहों में अपना भी एक जहाँ बसता है।
अपने बच्चों की हंसी में दिल का हर कोना कोना हँसता है।
फिर यूँ ही धीरे धीरे समय फिसलता जाता है हाथों से,
माँ – बाप बस याद बन जाते हैँ,
फिर एक दिन बच्चे भी अपने
नहीं रह जाते हैं।
हम खड़े रह जाते हैं वहीं ,
जहां सब आगे बढ़ जाते हैं।
पर ये बदलना ही तो जीवन है।
ये चक्र सदा ही चलता है।
जो आज है वो कल नहीं रहता है।
प्रकृति भी रूप बदल हमें
यही सिखलाती है।
“समय सब से बलवान है ।”
✍🏼पंकज एस पाण्डेय, शिकोहाबाद (यू. पी.)




