
जहाँ तक भी नजर जाती सियासत ही सियासत है।
मुहब्बत की जगह हरआँख में केवल अदावत है।।
नशा दौलत चढ़ा क्या मुफलिसी जाने,
तुम्हारी बस यही आदत दिलाती नित जलालत है।
दिलों से खेलते हैं लोग अपने स्वार्थ की खातिर ,
इसी से तो इबादत भी दिलों सेअब नदारत है।
किसी से दिल लगा कर तोड़ना ये कैसी बनी फितरत,
बने जो रहनुमा उनकी पुरानी ये विरासत है।
वफ़ा के बिन मुहब्बत और उल्फत बेइमानी है।
जहाँ पर हो वफा गीता’वहाँ उल्फत सलामत है।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
रायबरेली उत्तर प्रदेश
सादर समीक्षार्थ




