साहित्य

जय जगन्नाथ रथयात्रा

डाॅ सुमन

जय जगन्नाथ प्रभु, पुरी जिनका पावन धाम।

शत-शत नमन करें सभी, जपें सदा शुभ नाम॥

 

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को, निकले रथ सुकुमार।

उमड़ पड़े श्रद्धालु सभी, गूँजे जय-जयकार॥

 

संग बलभद्र, सुभद्रा संग, सुदर्शन की शान।

दिव्य अलौकिक रूप के, करते सब गुणगान॥

 

नीम-काष्ठ की मूर्तियाँ, अनुपम दिव्य स्वरूप।

भक्ति-भाव से जो निहारे, मिटें हृदय के क्लेश-रूप॥

 

सोलह, चौदह, बारह चक्र, तीनों रथ की शान।

नंदीघोष, तालध्वज, देवदलन की आन॥

 

श्रीमंदिर से गुंडिचा तक, चलता प्रेम प्रवाह।

दस दिन बाद बहुदा चले, बरसे प्रभु की चाह॥

 

रथ की डोरी छूने को, उमड़े सकल जहान।

सब पर कृपा करें प्रभु, जय-जय जगन्नाथ भगवान॥

 

भक्ति, प्रेम, सद्भाव का, जग में हो संचार।

मंगलमय हो विश्व सदा, जय जगन्नाथ दातार॥

 

स्वरचित

डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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