
ईंटों में सपनों की खुशबू, पसीने से घर गढ़ता हूँ,
धूप-धूल से जूझ-जूझकर जीवन-पथ मैं बढ़ता हूँ।
रोटी की खातिर सही, हर दिन खुद को मैं कसता हूँ,
कौन कहता है मैं मजदूर हूँ,
मैं एक अच्छा पिता जरूर हूँ!
छाले हैं हाथों में लेकिन, हिम्मत कभी न हारी है,
मेहनत ही मेरी पूँजी है, मेहनत ही तैयारी है।
दुनिया चाहे कुछ भी बोले, मुझको अपनी बारी है,
मैं बस अपने काम में ही चूर हूँ,
कौन कहता है मैं मजदूर हूँ।।
महलों की नींवों में मेरा हर दिन-रात समाया है,
मेरे श्रम से ही जग सारा सुंदर रूप में आया है।
फिर क्यों कोई मुझे छोटा कह, मेरा मान घटाया है,
जो दुनिया के ऐशो-आराम हैं,
ज़रूर उनसे थोड़ा मैं दूर हूँ।।
बच्चों की हँसी में ही तो मेरी सारी खुशहाली है,
उनकी आँखों के सपनों में मेरी ही रखवाली है।
उनके उजले कल के खातिर हर पीड़ा भी निराली है,
मैं बस अपने काम में ही चूर हूँ,
मैं एक अच्छा पिता जरूर हूँ।।
हीन न समझो श्रम को तुम, यह जीवन का सम्मान है,
मेहनत करने वाला ही तो धरती का भगवान है।
सर उठाकर जीता हूँ मैं, यही मेरा दस्तूर है,
मैं बस अपने काम में ही चूर हूँ,
कौन कहता है मैं मजदूर हूँ।।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश



