
हाथों में छाले, माथे पर पसीना,
फिर भी चेहरे पर न शिकवा, न शिकन।
ईंट-गारे से जो महल बनाते हैं,
खुद फुटपाथ पर सोते हैं वो मज़दूर जन।
सुबह की पहली किरण से पहले,
इनका दिन शुरू हो जाता है।
छत किसी और की बनाते-बनाते,
इनका अपना आशियाना टूट जाता है।
न छुट्टी का कैलेंडर, न ओवरटाइम का पैसा,
बस दो वक्त की रोटी का सपना।
बेटे की किताब, बेटी की चूड़ी,
इन्हीं हाथों से पूरा होता है अपना।
कुर्सी पर बैठकर भाषण सब देते हैं,
“मज़दूर देश की शान है”।
पर जो शान बनाता है मुल्क की,
उसके हिस्से में कहाँ सम्मान है?
आज 1 मई है, इनके नाम का दिन,
सिर्फ़ तारीफ़ों से पेट न भरेगा।
मज़दूरी पूरी, हक़ पूरा, इज़्ज़त पूरी —
जब ये मिलेगा, तब मज़दूर दिवस सरेगा।
*सलाम है उस हर हाथ को,*
जो रुकता नहीं, झुकता नहीं।
जिसके दम से ये दुनिया चलती है,
और वो खुद गुमनाम रहता है कहीं।
डॉ संजीदा खानम शाहीन




