साहित्य

श्रमिक दिवस

सुशीला फरमानिया 'दीप्त'

भूखा प्यासा नित श्रमिक, निशि-दिन करे प्रयास।
कठिन परिश्रम भूल सब, रखकर मन विश्वास ।।

सुबह-सुबह उठ देख रवि, लेता प्रभु का नाम।
दिन भर करता कर्म यह, नहीं करे आराम।।

मेहनतकश इंसान ये, नहीं चाहिए भोज।
रोटी की खातिर सदा, काम करे यह रोज।

धूप संग में तन जले, नहीं मानता हार।
श्रम ब्रह्मा श्रम विष्णु हैं, यही जानता सार।।

मुश्किल पथ पर भी चलें, रखकर मन में धीर।
जतन करें हरदम यही, छुपी रहे सब पीर।।

कार्य करे दिन-रात वह, शीत गर्म बरसात।
इनके श्रम की सब मनुज, अच्छी दो सौगात।।

कुलष रहा मजदूर गर, अंधकारमय देश।
जब सुविधा इनको मिलें, तब सुंदर परिवेश।।

शिल्पकार होते यही, दें दुनिया आकार।
वंदन करता जग उन्हें, मान रहा आभार।।

होते दुनिया में सदा, मानव सब मजदूर।
अपनी अपनी है विधा, काम करें भरपूर।।

सराहना सबकी करें, करते उन्हें प्रणाम।
जिनके कारण ही चलें, सकल जगत के काम।।

सुशीला फरमानिया ‘दीप्त’
संबलपुर, ओडिशा

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