
जब थक कर घर लौटता हूँ,
दरवाज़े पर नहीं,
माँ की आँखों में
दिया जलता मिलता है।
पूछती नहीं “कितना कमाया”,
बस पूछती है “खाया कि नहीं?”
उस एक सवाल में
पूरी दुनिया का ख़ज़ाना छुपा है।
उसके हाथों की लकीरों में
मेरी सारी तक़दीरें लिखी हैं।
जिन उँगलियों ने मुझे चलना सिखाया,
आज उन्हीं पर झुर्रियाँ गिनता हूँ।
वो कहती है “मैं ठीक हूँ”,
जबकि दवाई की शीशी
उसकी चुन्नी से झाँकती है।
माँ का झूठ सबसे सच्चा होता है।
एक दिन मैं भी बूढ़ा हो जाऊँगा,
पर जब तक माँ है,
मैं बच्चा ही रहूँगा।
उसकी गोद से बड़ा
कोई आसमान नहीं।
घर की दीवारों पर
माँ की हँसी टंगी है।
जिस दिन ये हँसी चुप हो गई,
उस दिन समझ लेना
घर, बस मकान रह जाएगा।
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज




