साहित्य

बिखरते रिश्ते 

मधु वशिष्ठ

बिखरते रिश्ते

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बिखरते रिश्ते सिमटे लोग

बहुत विकट है आज यह रोग

अवसाद बहुत है बड़ा चढ़ा

किसे सुनाए अपना दुखड़ा।

 

सोशल साइट पर मित्र बहुत है

अपना पर कोई ना मिला।

मोबाइल से सब तक पहुंच बहुत है

पास बैठने को पर कोई ना मिला।

किससे करें शिकवा किससे गिला।

फल अपनी करनी का ही तो मिला।

 

कोई क्यों कर होता मेरा

मैं भी तो किसी का ना हुआ।

समर्थ हूं मैं जरूरत नहीं है मुझे किसी की

एक समय यही मेरा स्टेटस था हुआ।

 

आज मुझसे ही दुनिया दूर हो गई,

ना कोई मेरा हुआ और ना ही मैं किसी का हुआ।

आज मोबाइल लिए हाथ में अकेला हूं मैं,

ब्लॉक कर दिया सब ने नंबर मेरा क्योंकि आज मैं खुद ही झमेला हुआ।

 

एक समय मैंने किसी की नहीं सुनी अब कोई मेरी नहीं सुनता।

तब मैं किसी से रिश्ता नहीं रखा अब कोई मुझसे रिश्ता नहीं रखता।

 

अब किसी से भी मैं क्या कोई शिकायत करूं,

संभल जाओ लोगों मैं तो बस केवल हिदायत करूं।

 

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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