
एक मौन-सी कोठरी में, दीपक-सा जलता कवि,
शब्दों की स्याही से, युगों का चित्र खींचता कवि।
हृदय की धड़कन को, अक्षर-अक्षर बुनता है,
पीड़ा को मोती बना, पुस्तक में चुनता है।
पुस्तक क्या है? बस कागज़ का पुलिंदा नहीं,
ये कवि की साँसें हैं, जो युग-युग तक चलती नहीं।
कवि रोया था जब, तब जन्मा था कोई गीत,
पुस्तक ने सहेजा उसे, बना दी अमर जीत।
कवि मिट जाता है, पर मरता नहीं कभी,
पुस्तक के पन्नों में, जीता है वो अभी।
तुलसी की चौपाई में, सूर का राग बसा,
निराला की क्रांति में, दिनकर का फाग बसा।
कवि एक भिखारी है, भावों का दान माँगे,
पुस्तक वो थाली है, जिसमें युग वरदान माँगे।
कवि जब मौन होता, पुस्तक तब बोलती है,
एक दीवाने की कलम, दुनिया को तौलती है।
पुस्तक अगर सागर है, तो कवि उसका बादल,
भावों को पीकर फिर, बरसाता है घन घन घन।
कवि बिना पुस्तक यूँ, जैसे दीप बिना बाती,
पुस्तक बिना कवि के, जैसे देह बिना छाती।
इसलिए मत पूछो, बड़ा कौन इन दोनों में,
कवि जन्म देता है, पुस्तक पालती गोदों में।
एक रचे तो दूसरा, युगों तक उसे गाए,
कवि और पुस्तक मिल, अमरत्व को पा जाए।
ममता झा मेधा
डालटेनगंज




