
अलविदा बशीर बद्र साहब, अदब का एक चिराग बुझ गया,
ग़ज़लों की महफ़िल में जैसे सन्नाटा सा छा गया।
आपकी शायरी में मोहब्बत की खुशबू बसती थी,
हर लफ़्ज़ में एक मीठी सी धड़कन पलती थी।
दर्द को भी आपने खूबसूरती से बयान किया,
टूटे दिलों को आपने फिर से जिया सिखाया।
कभी नज़्मों में सुकून, कभी ग़ज़लों में एहसास दिया,
हर शेर ने ज़िंदगी को नया विश्वास दिया।
काग़ज़ पर उतरती थी जब आपकी सादगी,
लगती थी जैसे बारिश में भीगी हुई ताज़गी।
आपके अल्फ़ाज़ों में अपनापन झलकता रहा,
हर पाठक का दिल आपसे जुड़ता रहा।
अब भी गूंजती है आपकी आवाज़ हवाओं में,
जैसे कोई शेर बसता हो दुआओं में।
शायरी की दुनिया में आपकी कमी रहेगी,
हर महफ़िल में आपकी जगह खाली रहेगी।
मगर आपके शेर हमेशा ज़िंदा रहेंगे,
हर दिल में यादों की तरह महकते रहेंगे।
अलविदा नहीं, ये तो बस एक पड़ाव है,
आपका कलाम तो अमर, और बे-मिसाल है।
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)



