साहित्य

आईना

सुषमा श्रीवास्तव

कहते हैं ,आईना झूठ नहीं बोलता,
पर झूठा है ये आईना औ ये स्थूल नयन भी।
मन की आँखें खोल रे मनवा,

दिख जाएगा सब सघन रे।
कभी आईना दिखाने की कोशिश न कर तू,
सजग हो तू खोल स्व हिय की आँखें ।
दिख जाएगा भीतर-बाहर,
क्या होता दिन- रैन रे।
प्राण का पंछी उड़ जाएगा,
मत कर सोच-सोच मेें देर रे।
पुनि-पुनि जो आवन ना चाहे,
बहुरि करे क्यों  ढेर रे,
समेट सब गठरी को खोले,
चलन चला  की बेर रे।
रचयिता-

सुषमा श्रीवास्तव
मौलिक कृति,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।

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