
कहते हैं ,आईना झूठ नहीं बोलता,
पर झूठा है ये आईना औ ये स्थूल नयन भी।
मन की आँखें खोल रे मनवा,
दिख जाएगा सब सघन रे।
कभी आईना दिखाने की कोशिश न कर तू,
सजग हो तू खोल स्व हिय की आँखें ।
दिख जाएगा भीतर-बाहर,
क्या होता दिन- रैन रे।
प्राण का पंछी उड़ जाएगा,
मत कर सोच-सोच मेें देर रे।
पुनि-पुनि जो आवन ना चाहे,
बहुरि करे क्यों ढेर रे,
समेट सब गठरी को खोले,
चलन चला की बेर रे।
रचयिता-
सुषमा श्रीवास्तव
मौलिक कृति,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




